टीआरपी।राजिम कल्प कुंभ 2026 में अव्यवस्थाओं का ऐसा आलम है कि अब गरियाबंद जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली ‘भगवान भरोसे’ नजर आ रही है। मेले के भव्य आयोजन के दावों के बीच कलाकारों और जनप्रतिनिधियों को खाने तक के लिए तरसना पड़ रहा है। इस घोर लापरवाही को देख स्थानीय विधायक रोहित साहू का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने मौके पर मौजूद कलेक्टर व जिला पंचायत सीईओ की मौजूदगी में अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई।
राजिम कुंभ छत्तीसगढ़ की आस्था का सबसे बड़ा संगम है। यहाँ आने वाले कलाकारों और मेहमानों का अपमान न केवल राज्य की छवि खराब करता है, बल्कि करोड़ों रुपये के बजट के दुरुपयोग की ओर भी इशारा करता है। इवेंट कंपनियों की मनमानी ने मेले की गरिमा पर सवालिया निशान लगा दिया है।
“कलाकारों का अपमान नहीं सहेगा छत्तीसगढ़”
विधायक रोहित साहू ने नाराजगी जताते हुए कहा कि दूर-दराज से आए कलाकारों और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के लिए भोजन और बैठने की न्यूनतम व्यवस्था भी नहीं की गई है। विधायक ने सीधे तौर पर इवेंट कंपनी और मॉनिटरिंग कर रहे अधिकारियों को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इवेंट कंपनी केवल बिल बनाने में व्यस्त है और धरातल पर सुविधाएं शून्य हैं।
कलेक्टर और सीईओ के सामने हंगामा
हंगामे के दौरान गरियाबंद कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ भी मौके पर मौजूद थे। विधायक ने अधिकारियों से पूछा कि “जब मुख्य अतिथि और कलाकारों के लिए भोजन उपलब्ध नहीं है, तो आम जनता की क्या स्थिति होगी?” प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विधायक की तल्खी देख अधिकारी बगलें झांकते नजर आए। आरोप है कि इवेंट कंपनी को दिए गए ठेके की शर्तों का पालन नहीं किया जा रहा है।
- विवाद की वजह: कलाकारों और जनप्रतिनिधियों को समय पर भोजन और सम्मानजनक स्थान न मिलना।
- प्रमुख आरोप: इवेंट कंपनी की लापरवाही और जिला प्रशासन की ढिलाई।
- सख्ती: विधायक रोहित साहू ने मौके पर ही अधिकारियों को फटकार लगाई।
- हालत: करोड़ों के बजट के बावजूद अव्यवस्थाओं के कारण मेला क्षेत्र में आक्रोश का माहौल।
विधायक के तेवरों को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि संबंधित इवेंट कंपनी पर पेनाल्टी लग सकती है या उसका भुगतान रोका जा सकता है। शासन स्तर पर भी इस हंगामे की गूंज सुनाई दे सकती है।
राजिम कुंभ अव्यवस्था का ‘टेंडर कनेक्शन’:
राजिम कल्प कुंभ 2026 में सामने आई अव्यवस्थाओं ने अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करना शुरू कर दिया है। सूत्रों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अनुसार, मेले के आयोजन के लिए निकाले गए टेंडर में पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाई गईं। आरोप है कि यह सारी अव्यवस्था उसी ‘सेटिंग’ का नतीजा है, जिसके तहत अनुभवी कंपनियों के बजाय नेताओं और अफसरों के खास लोगों को ठेके बांटे गए।
जब करोड़ों रुपये के सरकारी टेंडर में ‘अपनों’ को नवाजा जाता है, तो उसका सीधा असर काम की गुणवत्ता पर पड़ता है। राजिम कुंभ में कलाकारों को खाना न मिलना और मूलभूत सुविधाओं का अभाव यह साबित करता है कि बजट का बड़ा हिस्सा सुविधाओं के बजाय ‘मैनेजमेंट’ की भेंट चढ़ गया है।
अल्प समय का खेल और ‘खास’ पर मेहरबानी
गौरतलब है कि राजिम मेला प्रारंभ होने के ठीक पहले प्रशासन ने जो टेंडर निकाले थे, उनकी समय-सीमा को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठ रहे थे। अल्प सूचना टेंडर (Short Term Tender) निकालकर पूरी प्रक्रिया को इतनी जल्दबाजी में निपटाया गया कि अन्य सक्षम कंपनियां प्रतिस्पर्धा में शामिल ही न हो सकें। चर्चा है कि यह सब केवल इसलिए किया गया ताकि पहले से तय पसंदीदा कंपनी को ही काम मिल सके।
अव्यवस्था ने खोली भ्रष्टाचार की पोल
विधायक रोहित साहू द्वारा जताई गई नाराजगी के बाद अब यह चर्चा आम है कि जिस इवेंट कंपनी को करोड़ों का जिम्मा सौंपा गया, उसके पास इतने बड़े आयोजन का अनुभव ही नहीं था। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अफसरों और सफेदपोश नेताओं के संरक्षण के कारण ही यह कंपनी मनमानी कर रही है, जिसके चलते न कलाकारों को सम्मान मिल रहा है और न ही व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं।
टेंडर प्रक्रिया: सामान्य अवधि के बजाय बेहद कम समय (अल्पकालीन) के लिए निकाले गए टेंडर।
- मिलीभगत का आरोप: नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के करीबियों को लाभ पहुँचाने का दावा।
- असर: अनुभवी मैनपावर की कमी और आयोजन स्थल पर बुनियादी सुविधाओं का चरमराना।
- जनता का पैसा: करोड़ों के बजट के बावजूद अव्यवस्थाओं ने ‘मेगा इवेंट’ की छवि धूमिल की।
टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी के इन गंभीर आरोपों के बाद अब इस मामले की उच्च स्तरीय जांच (High-level Probe) की मांग उठने लगी है। यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो गरियाबंद जिला प्रशासन के कई बड़े चेहरों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।


