टीआरपी डेस्क। बिलासपुर हाई कोर्ट ने राज्य की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत अब प्रदेश के सभी मान्यता प्राप्त निजी हिंदी और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में कक्षा 5वीं और 8वीं की वार्षिक परीक्षाएं विभाग द्वारा ही आयोजित की जाएंगी।

यह फैसला छत्तीसगढ़ के उन 6200 निजी स्कूलों के लिए बाध्यकारी होगा जो अब तक अपनी परीक्षाएं खुद संचालित करते थे। इससे न केवल मूल्यांकन में निष्पक्षता आएगी, बल्कि उन फर्जी सीबीएसई (CBSE) स्कूलों का पर्दाफाश होगा जो बिना वैध मान्यता के बच्चों का भविष्य दांव पर लगाकर एडमिशन ले रहे थे। अब सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज छात्रों ही परीक्षा दे पाएंगे, जिससे फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी।

याचिका खारिज, पारदर्शिता की जीत

छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने शिक्षा विभाग के इस नियंत्रण को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। एसोसिएशन का तर्क था कि उन्हें अपनी परीक्षाएं स्वयं आयोजित करने का अधिकार मिलना चाहिए। हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ता (Intervener) और सामाजिक कार्यकर्ता विकास तिवारी ने शैक्षणिक गुणवत्ता और फर्जी स्कूलों के खतरे पर गंभीर दलीलें पेश कीं। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद एसोसिएशन की याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

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फर्जी स्कूलों के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

हाई कोर्ट के इस आदेश को प्रदेश में संदिग्ध तरीके से चल रहे स्कूलों के लिए करारा झटका माना जा रहा है। कई स्कूल खुद को सीबीएसई से संबद्ध बताकर एडमिशन ले रहे थे, जबकि उनके पास न तो केंद्रीय बोर्ड की मान्यता थी और न ही राज्य शासन की अनुमति। अब सरकारी स्तर पर परीक्षा होने से हर स्कूल को अपनी वास्तविक स्थिति और छात्रों का डेटा विभाग को सौंपना होगा।

शिक्षा विभाग की नई जिम्मेदारियां

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब स्कूल शिक्षा विभाग पर राज्य स्तर पर एक समान प्रश्न पत्रों का वितण , सभी निजी स्कूलों में विभागीय नियमों के तहत परीक्षा का संचालन। कॉपियों की जांच और परिणामों की घोषणा में पारदर्शिता की जिम्मेदारियां होगी।