टीआरपी डेस्क। छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी कहे जाने वाले पेंडारी नसबंदी कांड में 11 साल 4 महीने बाद जिला अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। एडीजे शैलेश कुमार की कोर्ट ने लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को लापरवाही और गैर-इरादतन हत्या का दोषी पाते हुए 2 साल की कैद और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
बता दें कि नवंबर 2014 में हुए इस कांड ने न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। सरकारी लक्ष्य को पूरा करने की अंधी दौड़ में 3 घंटे के भीतर 83 ऑपरेशन कर दिए गए थे, जिसके बाद 15 माताओं की मौत हो गई थी और 100 से अधिक महिलाएं अस्पताल पहुंच गई थीं।
महज 180 मिनट और 83 जिंदगियां
सूत्रों के अनुसार, तखतपुर ब्लॉक में यह शिविर लगा था। डॉक्टर पर आरोप था कि उन्होंने बिना किसी सुरक्षा मानक के मशीनी अंदाज में ऑपरेशन किए।
- लापरवाही की हद: एक प्रशिक्षु के साथ मिलकर डॉ. गुप्ता ने औसतन हर 2 मिनट में एक महिला का ऑपरेशन किया।
- तड़पती रहीं माताएं: शाम होते ही महिलाओं को उल्टी, तेज बुखार और दर्द शुरू हो गया। देखते ही देखते सिम्स और अपोलो अस्पताल में चीख-पुकार मच गई।
- दूधमुंहे बच्चे: इस त्रासदी में कई ऐसे बच्चे अनाथ हो गए जिन्होंने अपनी मां का चेहरा तक ठीक से नहीं देखा था।
लेकिन सबूतों के अभाव में छूटे कारोबारी
गौरतलब है कि इस मामले में पुलिस ने सिप्रोसिन दवा में चूहामार दवा (जिंक फास्फाइड) की मिलावट का दावा किया था। दवा सप्लाई करने वाली कंपनी के संचालकों को भी आरोपी बनाया गया था। हालांकि, अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया है।
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची थी गूंज
दरअसल, यह घटना इतनी बड़ी थी कि संयुक्त राष्ट्र (UNFPA) की तत्कालीन उपनिदेशक केट गिलमोर ने इसे घोर मानवीय त्रासदी करार दिया था। छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल दुनिया के सामने खुल गई थी।


