रायपुर। ‘भारत की संसद ने सन् 1963 में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए जो संकल्प लिया था उसके लिए इच्छाशक्ति के साथ साथ डा. राममनोहर लोहिया की बताई हुई नीतियों पर अमल करने की जरूरत है।‌ डॉ लोहिया ने शांति के समय कपोत और देश की सीमाओं के अतिक्रमण के समय बाज बनने की जरूरत बताते हुए कहा था पड़ोसियों से अच्छे सम्बन्ध , मजबूत लोकतंत्र और जागरूक नागरिकों से यह संभव होगा।’

प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक व राजनेता रघु ठाकुर ने रायपुर के वृन्दावन हाल में एक गोष्ठी को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए।‌ डॉ लोहिया के भारत की हिमालय नीति संबंधी विचारों पर आधारित पुस्तक के विमोचन व चर्चा के अवसर पर रघु ठाकुर अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए ये विचार व्यक्त कर रहे थे। यह पुस्तक अशोक पंकज ने लिखी है।

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति प्रो मनोज दयाल, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं जाने माने पत्रकार जगदीश उपासने तथा पूर्व संभागायुक्त डॉ संजय अलंग इस चर्चा में विद्वान वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
आयोजन में पूर्व सांसद चंद्रशेखर साहू, पुरातत्वविद राहुल सिंह, साहित्यकार गिरीश पंकज,प्रो. शाहिद अली, श्रमिक नेता एच एस मिश्रा, पूर्व विधायक गुरुदयाल बंजारे , साहित्यकार रामकुमार तिवारी, पत्रकार इमरान,अरविंद सिंह, डॉ अनूप सिंह, आदिवासी नेता फेंकन सिंह ,अरुण राणा , दिनेश सिंह , डॉ साव , दिलीप कौशिक, छत्तीसगढ़ के नवोदित फिल्म अभिनेता राजकुमार साहू, छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के कार्यकर्त्ता सामाजिक कार्यकर्ता रामगुलाम ठाकुर , पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर, रवि भोई, उचित शर्मा श्रीमती सविता पाठक योगेश सहित रायपुर नगर व छत्तीसगढ़ के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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रघु ठाकुर ने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारत की वर्तमान सरकार द्वारा हिमालय क्षेत्र में रेल व सड़कों के विस्तार की सराहना करते हुए कहा कि हमें यह आकलन करने की जरूरत है देश की सीमाओं की सुरक्षा व हड़पी गई जमीन को वापस पाने में क्या हम सक्षम हैं और हमारी सामरिक – आर्थिक हैसियत क्या है। आज एक दिन का युद्ध भी अठारह से बीस हजार करोड़ रुपए का होता है। कौन देश कितने दिन के लिए युद्ध की कीमत चुकाने की स्थिति में है। डॉ लोहिया ने तो हिमालय की गोद में बसे नेपाल – भूटान – तिब्बत आदि भारत के पड़ोसी देशों को ‘भाई हिमालय’ का नाम देते हुए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार पर उनसे संबंध अच्छे बनाने के लिए कहा था। भारत की सीमा को मानसरोवर से आगे बताते हुए मैकमोहन रेखा की सीमा को भी नकारा था। वे चीन के साम्राज्यवादी इरादों को समझते थे इसीलिए जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में चीन का समर्थन किया तब इसे भारत की भूल बताया था। ऐसे ही जब चीन ने तिब्बत पर हमला किया तब इसे तिब्बत की भ्रूण हत्या करार दिया। चीन ने जब मंगोल नस्ल के आधार पर हिमालय के निवासियों के साथ समानता बताने की कोशिश की तब लोहिया ने इस नस्लीय विभाजन को तथ्य से परे प्रमाणित किया था।

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कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति प्रो. मनोज दयाल ने डॉ लोहिया की चिंताओं में हिमालयी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा कि वे समूचे हिमालय क्षेत्र में फलों की खेती के जरिए यहां के लोगों को तंदुरुस्त देखना चाहते थे।


जाने माने पत्रकार व माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के पूर्व कुलपति जगदीश उपासने ने डॉ लोहिया को ऋषि बताते हुए कहा हिमालय के लिए अलग से मंत्रालय बनाने की जरूरत को सबसे पहले उन्होंने ही महसूस किया था।

पूर्व संभागायुक्त डॉ संजय अलंग ने कहा कि लोहिया जानते थे कि सांस्कृतिक एकता आवाजाही से और रोजगार से बनती है। उन्होंने ही नेफा को उर्वशियम जैसा सुंदर नाम उस समय दिया था। आज अरुणाचल में खूब कीवी की पैदावार होती है और उससे और भी चीजें बनती हैं। लोहिया फलों से लदा ऐसा ही हिमालयी क्षेत्र चाहते थे। डॉ अलंग ने नीति को योजना में अंतरित करने की जरूरत बताते हुए कहा कि ऐसा होने पर ही क्षेत्रीय असंतुलन दूर होगा। इस क्रम में उन्होंने केन्द्रीय विद्यालय व नवोदय से लेकर आंगनवाड़ी तक के उदाहरण इस संदर्भ में दिए।

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परिचर्चा का संचालन पत्रकार जयंत सिंह तोमर ने किया तोमर ने विस्तार से पुस्तक के बारे में जानकारियां देते हुए कहा कि डॉ लोहिया ने तिब्बत और भारतीय सीमा की रक्षा के लिए संपूर्ण हिमालय नीति और हिमालय मंत्रालय बनाने की बात कही थी। वे हिमालय को प्रहरी नहीं बल्कि भाई हिमालय कहते थे। पंकज ने बड़ी मेहनत से यह पुस्तक लिखी है जिसे सभी क्षेत्रों में पढ़ा जाना चाहिए। धन्यवाद ज्ञापन जावेद उस्मानी ने किया।
अतिथियों का स्वागत मातामणि तिवारी, अशोक पंडा, श्याम मनोहर सिंह व फेकन सिंह ने किया। श्रोताओं से हाल खचाखच भरा रहा और बड़ी संख्या में हाल के बाहर खड़े होकर श्रोताओं ने सभा को सुना।