छत्तीसगढ़ में निर्वाचित विधायक–सांसदों के साथ ही मंत्रियों को स्वेच्छानुदान की राशि जरूरतमंदों को बांटने के लिए मिलती है। हर वर्ष इसका आंकलन होता है कि किस जन प्रतिनिधि ने राशि को बांटने में कितनी रुचि दिखाई, कितने लोगों को राशि बांटी गई, मगर इस बात की चर्चा बहुत ही कम होती है कि कितने पात्र और अपात्र लोगों को यह राशि बांटी गई। हालांकि चंद पत्रकार और कार्यकर्ता जरूर यह मुद्दा उठाते हैं, मगर कुछ दिनों तक खबरों की सुर्खियां बनने के बाद इस मुद्दे को यूं ही भुला दिया जाता है। जरूरत इस बात की है कि देश–प्रदेश के जिम्मेदार लोगों को इस पर ध्यान देते हुए स्वेच्छानुदान राशि की बेहतरीन और पारदर्शी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

स्वेच्छानुदान की राशि किन लोगों को बांटने का है प्रावधान..?

गरीब या जरूरतमंदों को आकस्मिक आर्थिक मदद के लिए विधायकों को स्वेच्छानुदान व जनसंपर्क निधि जारी करने का अधिकार दिया गया है। विधायक इसका इस्तेमाल जरूरतमंदों के लिए कर सकते हैं। इसके अलावा खेल व सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न क्लबों व मंडलियों को उनके नाम से निधि जारी करने का अधिकार दिया गया है।
स्वेच्छानुदान का मुख्य उद्देश्य आकस्मिक आर्थिक मदद की आवश्यकता वाले लोगों (जैसे बीमारी, शिक्षा आदि) की सहायता करना है। हालांकि, इसे “स्वेच्छा” (Discretion) के आधार पर आवंटित किया जाता है, जिससे इसके दुरुपयोग की संभावना रहती है।

अधिकांश राशि अपात्रों के हवाले…

छत्तीसगढ़ में विधायकों और मंत्रियों द्वारा स्वेच्छानुदान (Discretionary Grant) की राशि के कथित तौर पर अपात्र लोगों को वितरण को लेकर विवाद और आरोप सामने आते रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में अक्सर यह आरोप लगते हैं कि विधायक या मंत्री अपनी मर्जी से स्वेच्छानुदान की राशि उन लोगों को दे देते हैं, जो जरूरतमंद नहीं हैं या अपात्र हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विधायक प्रभारी, पार्टी कार्यकर्ताओं या उनके रिश्तेदारों को स्वेच्छानुदान की राशि देने के मामले सामने आ रहे हैं, जबकि नियम अनुसार यह राशि केवल गरीब या आकस्मिक जरूरत वाले लोगों के लिए होनी चाहिए।

अपात्रों को स्वेच्छानुदन बांटने के दर्जनों मामले

विधायक चाहे किसी भी पार्टी के हों, उन्हें सरकार की ओर से स्वेच्छानुदान के लिए निश्चित राशि जरूरतमंदों को बांटने के लिए दी जाती है। राशि आबंटन की सूची पर नजर डालें तो इनमें से अधिकांश नाम ऐसे होते हैं जिन्हें रकम बांटने का कोई औचित्य नहीं होता। ताजा मामला मनेंद्रगढ़ के विधायक और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से जुड़ा हुआ है। जिले के एक आरटीआई कार्यकर्ता ने पुख्ता जानकारियों के साथ जो शिकायत की है, उससे तो यही लगता है, मानो उन्हें यह राशि चुनाव के दौरान मदद करने वाले कार्यकर्ताओं और अपने नाते रिश्तेदारों को बांटने के लिए दी गई है। RTI कार्यकर्ता राजकुमार मिश्रा ने इस संबंध में जो जानकारियां दी है वह काफी चौंकाने वाली है। उनके मुताबिक राशि आबंटन में कई प्रकार की वित्तीय अनियमितताएं हैं। स्वास्थ्य मंत्री के द्वारा अपने लोगों, राजनीतिक दल के व्यक्तियों, उनके ही कर्मचारियों और शुभचिंतकों आदि को बिना किसी गंभीर कारण के, नियम विरुद्ध, गलत कारण दर्शित करते हुए स्वेच्छा अनुदान की राशि प्रदान करने का अनुशंसा किया गया है। मिश्रा द्वारा की गई शिकायत के कुछ प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं:

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0 वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में स्वास्थ्य मंत्री के द्वारा जो स्वेच्छा अनुदान की राशि हितग्राहियों को आवंटित करने के लिए अनुशंसा की गई है, कुछ अति बुजुर्ग महिला एवं पुरुषों को जो अशिक्षित हैं, उन्हें शिक्षा के नाम पर 20-20 हजार रुपए देने की अनुशंसा की गई है।

0 मंत्री के जो बेहद करीबी लोग हैं उन्हें भी शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए 20 से 25000 रुपए देने की अनुशंसा की गई है। जिन लोगों को शिक्षा के नाम पर स्वैच्छिक अनुदान की राशि दी गई है उनका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है।

0 एसईसीएल के कुछ कर्मचारियों को भी शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर स्वेच्छा अनुदान की राशि दी गई है, जबकि ऐसे कर्मचारियों का वेतन ₹100000 महीना से अधिक ही होता है।

0 यदि किसी घर में पांच लोग हैं तो दस्तावेज के अनुसार 5 लोग एक साथ बीमार हो गए हैं, उनमें से प्रत्येक को  25-25 हजार रुपए प्रत्येक के लिए स्वेच्छानुदान की राशि दी गई है। इस प्रकार स्वैच्छिक अनुदान की राशि का दुरुपयोग किया गया है।

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दूसरे जनप्रतिनिधि भी पीछे नहीं

छत्तीसगढ़ सरकार में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल द्वारा स्वेच्छानुदान की राशि का दुरूपयोग किए जाने का यह केवल नमूना है। सच तो यह है कि अधिकांश विधायक–सांसद राशि बांटने के लिए यही तरीका अपनाते हैं। जायसवाल से पूर्व उनके विधानसभा क्षेत्र में काबिज रहे कांग्रेस विधायक विनय बिहारी जायसवाल भी इस वजह से चर्चा में रहे। उन्होंने तो अपने इलाके के पूरे पत्रकारों को भी स्वेच्छानुदन की राशि बांटी। हद तो तब हो गई जब एक वरिष्ठ पत्रकार ने राशि का चेक यह कहते हुए लौटा दिया कि न तो उन्होंने विधायक से राशि मांगी है और न ही उन्हें इसकी जरूरत है।

पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल भी स्वेच्छानुदान राशि के बंदरबाट को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। उन्होंने महिला कांग्रेस नेत्रियों, नेताओं, युवा कांग्रेस पदाधिकारी, एनएसयूआई नेताओं और ऐसे लोगों को स्वेच्छानुदान की राशि बांट दी है, जिन पर स्वेच्छानुदान की राशि पाने की पात्रता ही नहीं है।

विनय जायसवाल की अनुशंसा पर पार्टी कार्यकर्ताओं व पत्रकारों को गरीब बता कर मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान दे दिया गया, जबकि इनमें ‌से कुछ लोग लखपति और करोड़पति की हैसियत रखते हैं।

सीएम की स्वेच्छानुदान राशि को लेकर भी आरोप

छत्तीसगढ़ में मंत्रियों और विधायकों ही नहीं सीएम की स्वेच्छानुदान राशि को भी अपात्रों को बांटे जाने के आरोप लग रहे हैं। गरियाबंद जिले के जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम ने तो बाकायदा रील बनाकर अपने जिले में सीएम के स्वेच्छानुदन से बंटी राशि के हितग्राहियों की सूची भी लगाई है। नेताम का कहना है कि इसमें भाजपा के पार्टी कार्यकर्ताओं, मंडलअध्यक्ष सहित ऐसे लोग जो बाकायदा इनकम टैक्स और जीएसटी पटाते हैं, उन्हें भी राशि का आबंटन किया गया है। नेताम कहते हैं कि स्वेच्छानुदान राशि पर पहला हक गरीब, पीड़ित जरूरतमंदों और दिव्यांगों का है।

वर्ष 2019 के नियमों के अनुसार, मुख्यमंत्री के लिए स्वेच्छानुदान की राशि 40 करोड़ रुपये तक प्रति वर्ष निर्धारित की गई है, और वे किसी एक व्यक्ति या संस्था को 5 लाख रुपये तक दे सकते हैं।

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क्या कहता है नियम..?

नियम कहता है कि स्वैच्छिक अनुदान की राशि निकालने से पहले नियमों के अनुसार लाभार्थी की पात्रता, उद्देश्य, अधिकतम राशि आदि शर्तों का पालन करना आवश्यक होता है। स्वेच्छा अनुदान की राशि किसी की दया या उपकार नहीं है, यह किसी मंत्री या जनप्रतिनिधि का निजी पैसा नहीं होता, यह राज्य सरकार का पैसा है इससे किसी सार्वजनिक कार्य में ही उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार की भुगतान की गई राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना भी अति आवश्यक होता है।

आरटीआई कार्यकर्ता मिश्रा के द्वारा बताया गया कि अपात्र लोगों को यह राशि बांटे जाने का कृत्य वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है और यह आपराधिक कृत्य है। जिस प्रकार अनुदान की राशि देने की अनुशंसा की गई है वह भारत के संविधान का अनुच्छेद 266(3) का उल्लंघन है।

शिकायत के बाद जांच की अनुशंसा

आरटीआई कार्यकर्ता राजकुमार मिश्रा के द्वारा इस मामले में कलेक्टर से शिकायत करते हुए जांच की मांग की गई है और अनुरोध किया गया है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में जिन व्यक्तियों को स्वेच्छानुदान की राशि दी गई है उनके बारे में संपूर्ण जांच की जाए।

इधर केंद्र सरकार और EOW से इस संबंध में की गई शिकायत के बाद जहां एक ओर वित्त मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव से जानकारी मांगी है, वहीं EOW ने भी मामले की जांच के लिए संबंधित विभाग के प्रमुख को पत्र लिखा है।लब्बोलुआब यह है कि चुनाव के दौरान जनता के समक्ष हाथ जोड़कर वोट की भीख मांगने वाले नेता चुने जाने के बाद खुले आम नियम के विरुद्ध अपात्र लोगों को स्वेच्छानुदान की राशि बांटते फिरते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह के मुद्दे उठाए जाने के बाद जन प्रतिनिधियों का जमीर जागेगा, और इसके संबंध में बनाए गए नियमों का पालन कराने वाले अफसर थोड़ी सख्ती दिखाएंगे। ताकि स्वेच्छानुदन की राशि का इस्तेमाल वास्तव में पात्र लोगों के हित में किया जा सके।