टीआरपी डेस्क। अक्षय तृतीया का पावन पर्व नई शुरुआत और अक्षय फल की प्राप्ति का दिन माना जाता है। इस अवसर पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधिवत पूजा करने से घर में स्थाई सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किए गए दान और शुभ संकल्पों का फल कभी समाप्त नहीं होता।

पवित्र स्नान और पूजा की तैयारी पूजा की शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और साफ पीले कपड़े पहनने से करनी चाहिए। पूजा के लिए एक छोटी चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान की प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं और चंदन, अक्षत व पीले फूल अर्पित करें। मां लक्ष्मी को कमल या गुलाब का फूल चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान व्रत का संकल्प लेकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना और अंत में घी के दीपक से आरती करना मानसिक शांति प्रदान करता है।

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पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

पूजा की थाली में रोली, कुमकुम, अक्षत, हल्दी और चंदन रखें। भोग के लिए पीली मिठाई, सत्तू, गुड़ और ताजे फल जैसे खरबूजा या आम तैयार करें। भगवान विष्णु की पूजा में ताजे तुलसी दल का प्रयोग अवश्य करें। साथ ही धूप, अगरबत्ती और शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। कलश स्थापना के लिए नारियल, कलावा और जल का पात्र पास रखें। प्रतीक के रूप में पूजा में सोने-चांदी का सिक्का या मिट्टी का नया कलश भी रख सकते हैं।

दान का महत्व

भविष्य के नियम शास्त्रों के अनुसार, अक्षय तृतीया पर जल से भरे मिट्टी के घड़े, अनाज और नए वस्त्रों का दान करना पुण्यकारी होता है। पूजा के बाद किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार भेंट दें। इस दिन दूसरों की बुराई से बचकर मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए। सात्विक जीवन शैली अपनाकर और कड़वी बातों से दूर रहकर परिवार में मेल-जोल बढ़ाया जा सकता है।

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शुभ संकल्प और नई शुरुआत

अक्षय तृतीया का हर क्षण शुभ होता है, इसलिए इसे किसी भी नए काम की शुरुआत के लिए उत्तम माना जाता है। इस दिन अपनी बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छे गुणों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। अपनी मेहनत की कमाई का एक छोटा हिस्सा समाज की भलाई में लगाने का संकल्प लेने से जीवन में बरकत आती है और दुखों का नाश होता है।