टीआरपी डेस्क। आज से संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र शुरू हो रहा है। जिसे देश की लोकतांत्रिक दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने इस सत्र को नारी शक्ति और नया प्रतिनिधित्व ढांचा जैसे दो बड़े एजेंडे से जोड़ दिया है, जिससे इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है।
सबसे ज्यादा चर्चा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर है, जिसे महिला आरक्षण के नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इस कानून को पूरी तरह लागू कर दिया जाए, ताकि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ प्रतीकात्मक न रहकर वास्तविक शक्ति में बदल सके। यह कदम दशकों से लंबित महिला आरक्षण की मांग को जमीन पर उतारने की दिशा में बड़ा परिवर्तन साबित हो सकता है।
इसके साथ ही, लोकसभा सीटों के विस्तार की योजना ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर करीब 850 करने का प्रस्ताव न केवल संसद की संरचना बदलेगा, बल्कि पूरे देश में राजनीतिक समीकरणों को भी नया आकार देगा। सीटों की इस संभावित वृद्धि के बाद परिसीमन प्रक्रिया के जरिए निर्वाचन क्षेत्रों को जनसंख्या के हिसाब से फिर से तय किया जाएगा, जिससे प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनाया जा सके।
सरकार का फोकस केवल संसद तक सीमित नहीं है। दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुदुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी है, जो इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप देने की ओर संकेत करता है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी इस सत्र को ऐतिहासिक बताते हुए कहा है कि यह देश की माताओं और बहनों को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम होगा। उनका यह संदेश साफ करता है कि सरकार इस मुद्दे को केवल कानून नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के रूप में पेश करना चाहती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संसद में इन प्रस्तावों पर कैसी बहस होती है और क्या सभी दल मिलकर इन ऐतिहासिक बदलावों को सहमति के साथ आगे बढ़ा पाते हैं। यह विशेष सत्र आने वाले वर्षों की राजनीति, प्रतिनिधित्व और सत्ता संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकता है।



