जगदलपुर/बीजापुर। बस्तर संभाग में नक्सल हिंसा के दौर में पलायन कर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बसे हजारों विस्थापित परिवारों की घर वापसी को लेकर प्रशासन सक्रिय हो गया है। पिछले दिनों दंतेवाड़ा में बस्तर संभाग के कमिश्नर की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में पुनर्वास और मूल गांवों में बसाने की दिशा में विस्तृत मंथन किया गया।
सलवा जुड़ूम के दौर में हुआ था पलायन
सलवा जुड़ूम के दौरान जब नक्सल चरम पर था, तब बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा के सीमावर्ती इलाकों से हजारों परिवार भयवश पलायन कर गए थे, जो अब तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में निवास कर रहे हैं। सर्वे में सामने आया है कि बस्तर संभाग के कुल 6,939 परिवारों के 31,098 सदस्य अब भी दूसरे राज्यों में रह रहे है। इनमें से बड़ी संख्या में परिवार अपने मूल गांव लौटना चाहते हैं, लेकिन जमीन, आवास, रोजगार और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अब तक वापसी संभव नहीं हो पाई है।

जमीन और संपत्तियों पर हो गया है कब्जा
सलवा जुड़ूम का वाकया दो दशक पहले का है और तब जो लोग यहां रह गए उन्होंने पलायन करने वाले वाले परिवारों की जमीन जायदाद पर कब्जा कर लिया था। इन संपत्तियों को वापस दिलाना टेढ़ी खीर साबित होगा। इसके लिए भी प्रशासन ने सर्वे शुरू कर दिया है।

योजनाबद्ध रणनीति पर काम करेगा प्रशासन
प्रशासन ने स्पष्ट किया कि जो परिवार बस्तर लौटना चाहते हैं, उनके लिए भूमि, आवास, शिक्षा और रोजगार की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। वहीं जो परिवार तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में ही रहना चाहते हैं, उनके लिए संबंधित राज्य सरकारों से समन्वय कर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
पुनर्वास की दिशा में जारी है कार्य
जिला पंचायत बीजापुर की सीईओ नम्रता चौबे ने बताया कि पुनर्वास योजना के तहत प्रवासित होने वाले परिवारों को आवास सहित शासकीय योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। बीजापुर जिले के 1001 परिवारों के 5063 सदस्य वर्तमान में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बसे हैं, जिन्हें पुनर्वासित करने की दिशा में कार्य जारी है। राज्य व केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जा रहा है। साथ ही सलवा जुडूम के दौरान विस्थापित परिवारों के मूल गांवों का सर्वे कर उनके घर और जमीन की स्थिति का आकलन किया जाएगा, ताकि पुनर्वास की प्रक्रिया को गति मिल सके।

घर वापसी की जगी उम्मीद
वर्षों से विस्थापन का दर्द झेल रहे परिवारों के लिए यह पहल उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है। पहचान और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे इन लोगों के लिए अब अपने गांव लौटने का रास्ता धीरे-धीरे खुलता नजर आ रहा है।
सबसे अहम चुनौती– पहचान और अधिकार
कमिश्नर की बैठक में यह भी सामने आया कि कई विस्थापितों के पास जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और भूमि पट्टा नहीं है, जिसके चलते वे शासकीय योजनाओं से वंचित हैं। वहीं कई गांवों में बिजली, सड़क, पेयजल और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं भी अधूरी हैं।

बैठक में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के निर्देशों पर भी चर्चा की गई, जिसमें पुनर्वास के तहत भूमि, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। न्यूनतम पांच एकड़ भूमि, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने जैसे प्रस्तावों पर भी विचार किया गया।




