टीआरपी डेस्क। लोकसभा चुनाव 2024 में सीटों की संख्या कम होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रपति चुनाव के मोर्चे पर बेहद मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। हाल के विधानसभा चुनावों में मिली जीत और राज्यों में बढ़ते दबदबे ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के लिए अगले राष्ट्रपति के चयन की राह आसान कर दी है। राज्यसभा में बढ़ती सदस्य संख्या और बड़े राज्यों में सहयोगियों के साथ मजबूत पकड़ ने लोकसभा में हुए नुकसान की भरपाई कर दी है।
निर्वाचक मंडल का गणित
राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। लोकसभा में बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 रह गई थीं, जिससे निर्वाचक मंडल में उसके कुल वोटों में करीब 44,100 की कमी आई। हालांकि, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में एनडीए की मौजूदा ताकत इस कमी को दूर करने में प्रभावी साबित होगी।
राज्यों की निर्णायक भूमिका
निर्वाचक मंडल में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, जहां एक विधायक के वोट का मूल्य देश में सबसे अधिक है। यूपी के विधायकों के कुल वोटों का भार 83,800 से ज्यादा है। इसके अलावा, महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए की सदस्य संख्या पिछले चुनाव के 150 से बढ़कर 237 तक पहुंच गई है। बिहार में भी एनडीए की ताकत 125 से बढ़कर 202 हो गई है। पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी के विधायकों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है, जो राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी को बड़ी बढ़त दिलाएगी।
वोटों का मूल्य और समीकरण
राष्ट्रपति चुनाव में हर सांसद के वोट का मूल्य समान होता है, जबकि विधायकों के वोट का मूल्य राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होता है। लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष ने एनडीए सरकार के स्थायित्व पर सवाल उठाए थे, लेकिन हरियाणा में बीजेपी की जीत और अन्य राज्यों में बढ़ते जनाधार ने विपक्षी दावों को कमजोर कर दिया है। अगले साल जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले बीजेपी और उसके सहयोगी दल निर्णायक स्थिति में पहुंच चुके हैं, जिससे अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुनना उनके लिए काफी सरल हो गया है।


