कबीरधाम। जिले के कई धान खरीदी केंद्रों में अब सन्नाटा पसरा हुआ है। खाली चबूतरे, किनारे पड़ी तिरपालें और इधर-उधर बिखरी फटी बोरियां तो नजर आ रही हैं, लेकिन धान का एक भी बोरा दिखाई नहीं दे रहा। दूसरी ओर सरकारी रिकॉर्ड में अब भी हजारों क्विंटल धान का उठाव लंबित दर्शाया जा रहा है। ऐसे में करोड़ों रुपये मूल्य के धान के गायब होने को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

रिकॉर्ड में 69 हजार क्विंटल धान का स्टॉक

कबीरधाम जिले के धान खरीदी केंद्रों — सूरजपुर, पेंड्रीकला, जुनवानी, रणवीरपुर, ऊसरवाही, समनापुर, तरेतगांव, कोदवागोड़ान और धरमगढ़ — का अवलोकन करें तो अधिकांश केंद्रों में धान का एक भी बोरा मौजूद नहीं है। हैरानी की बात यह है कि विभागीय दस्तावेजों में इन केंद्रों में अभी भी लगभग 69 हजार क्विंटल धान का उठाव शेष बताया जा रहा है। यानि जमीनी स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड में स्पष्ट विरोधाभास नजर आ रहा है।

सूत्रों के अनुसार जिला प्रशासन ने मई माह के अंत तक धान उठाव की प्रक्रिया पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इसके लिए कलेक्टर द्वारा समीक्षा बैठक भी आयोजित की गई थी। वहीं खाद्य विभाग का कहना है कि धान उठाव की प्रक्रिया अभी जारी है तथा केंद्र प्रभारियों को पूरा स्टॉक जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।

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विभाग का यह भी कहना है कि जिन केंद्रों में भौतिक सत्यापन के दौरान धान की कमी पाई गई है, उन्हें निर्धारित समयावधि के भीतर कमी की भरपाई करने का अवसर दिया गया है। निर्धारित समय में स्टॉक पूरा नहीं करने पर संबंधित अधिकारियों और केंद्र प्रभारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

करोड़ों का धान आखिर कहां गया..?

हालांकि मौके पर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है। यदि रिकॉर्ड के अनुसार लगभग 69 हजार क्विंटल धान अभी भी शेष है, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 21 करोड़ रुपये से अधिक है, तो आखिर यह धान कहां है? यदि धान का उठाव नहीं हुआ तो उसका भौतिक स्टॉक केंद्रों में क्यों नहीं दिखाई दे रहा? और यदि स्टॉक में कमी है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

शासन के नियमों के अनुसार यदि किसी उपार्जन केंद्र में निर्धारित स्टॉक की तुलना में 2 प्रतिशत से अधिक की कमी पाई जाती है, तो संबंधित केंद्र प्रभारी के विरुद्ध तत्काल निलंबन और एफआईआर की कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में हजारों क्विंटल धान की कथित कमी का मामला और भी गंभीर हो जाता है।

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जानकारी के मुताबिक अब तक केवल कुछ केंद्र प्रभारियों के विरुद्ध ही प्रकरण कलेक्टर न्यायालय में प्रस्तुत किए गए हैं, जबकि बड़े पैमाने पर स्टॉक अंतर को लेकर व्यापक कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है।

विपक्ष को मिला मुद्दा

उधर विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर सरकार और प्रशासन को घेरने की तैयारी में जुट गया है। आने वाले दिनों में यह मामला जिले की राजनीति का बड़ा विषय बन सकता है, क्योंकि सवाल केवल धान का नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी संसाधनों और जवाबदेही का है। युवा कांग्रेस के प्रदेश सचिव आकाश केसरवानी ने आरोप लगाया है कि पूर्व में भी खरीदी केंद्रों में धान का स्टॉक गायब होने के प्रदेश भर में अनेक मामले सामने आये। इनमें से कई के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया। वर्तमान में जिन केंद्रों में धान के स्टॉक में हेराफेरी की गई है, उनके स्टाफ को बचाने का प्रयास करते हुए उन्हें गायब धान की भरपाई करने का मौका दिया जा रहा है।

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वहीं खाद्य अधिकारी चंद्रशेखर देवांगन का कहना है कि जहां भी धान का स्टॉक कम है, वहां के प्रभारियों को नोटिस जारी किया गया है। उनके द्वारा स्टॉक की प्रतिपूर्ति नहीं की जाती है तो उनके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज 70 हजार क्विंटल धान आखिर कहां है? इसकी जवाबदेही किसकी है? और प्रशासन इस पूरे मामले में कब तक ठोस कार्रवाई करता है? इन सवालों के जवाब का इंतजार अब किसानों के साथ-साथ पूरे जिले को है।