नक्सल पीड़ितों का फूटा गुस्सा, पुनर्वास बैठक का नतीजा शून्य

टीआरपी। छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा का दंश झेल चुके पीड़ित परिवारों के लिए बनाई गई सरकारी पुनर्वास नीति सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है, जिसके चलते 10 जून को हुई उच्च स्तरीय पुनर्वास समिति की बैठक के बाद भी पीड़ितों को खाली हाथ लौटना पड़ा है। शासन के नियमानुसार 120 दिनों के भीतर पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी फाइलें दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं।

यह मामला सीधे तौर पर उन परिवारों के आत्मसम्मान और आजीविका से जुड़ा है जिन्होंने देश के लिए अपनी जमीन, घर और अपनों को खोया है। सरकार की “नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति-2025” पर से अगर इन परिवारों का भरोसा उठा, तो यह शासन की नीतियों और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करेगा।

नक्सल पीड़ित परिवारों की अर्जी पर पुलिस विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी, जिसके बाद आईजी (IG) स्तर से कलेक्टर को बकायदा अनुशंसा पत्र भी भेजा गया। इसके बाद पुनर्वास को लेकर आधिकारिक बैठकें भी आयोजित की गईं, लेकिन अंतिम निर्णय के नाम पर नतीजा अब तक पूरी तरह शून्य रहा है।

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नक्सल पीड़ित धीरेन्द्र साहू ने बताया कि 10 जून 2026 को पुनर्वास समिति की एक महत्वपूर्ण मीटिंग रखी गई थी, जिसमें पीड़ितों ने नीति के तहत अपने वैध अधिकार समिति के सामने रखे। इस बैठक से परिवारों को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन पूरी चर्चा के बाद भी समिति एक भी ठोस फैसला नहीं ले सकी। पीड़ितों का कहना है कि उनकी मुख्य मांगें बेहद स्पष्ट हैं— नीति के प्रावधानों के तहत सरकारी नौकरी (या सहायता राशि), शहरी या ग्रामीण क्षेत्र में आवासीय जमीन और केंद्रीय सहायता राशि।

पीड़ितों का सब्र अब पूरी तरह जवाब देने लगा है। उनका कहना है कि जब हमारी पीड़ा को देखकर शासन ने खुद नीति तय की है, तो फिर नौकरशाही अंतिम फैसला लेने में इतनी लंबी प्रतीक्षा क्यों करवा रही है? स्थानीय स्तर पर सुनवाई न होने से निराश होकर अब इन पीड़ित परिवारों ने अपनी मांग सीधे राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री और उच्चाधिकारियों के समक्ष रखने का फैसला किया है।

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नीति की समय-सीमा: नियमानुसार आवेदन के 120 दिनों के भीतर पुनर्वास का फैसला अनिवार्य है।

प्रमुख मांगें: आवासीय जमीन, सरकारी नौकरी (या एवज में सहायता राशि) और केंद्रीय सहायता फंड।

अंतिम बैठक की तारीख: 10 जून 2026 को हुई पुनर्वास समिति की बैठक में कोई निर्णय नहीं हो सका।

स्थानीय प्रशासन और पुनर्वास समिति के ढुलमुल रवैये से नाराज नक्सल पीड़ित परिवार अब बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। पीड़ितों ने साफ कर दिया है कि वे जल्द ही राजधानी रायपुर का रुख करेंगे और सीधे शासन के शीर्ष स्तर पर अपनी बात रखकर अपने हक की लड़ाई लड़ेंगे।