बिलासपुर। 33 वर्षों तक सरकारी भूमि पर लगातार खेती करने वाले एक ग्रामीण को आखिरकार उसी जमीन का मालिकाना हक मिल गया। बिलासपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने प्रतिकूल कब्जा यानी “Adverse Possession” के सिद्धांत के आधार पर नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के पक्ष में फैसला सुनाया।
क्या है पूरा मामला ?
प्रकरण के अनुसार, गांव सर्वन देवरी स्थित खसरा नंबर 894 की 0.340 हेक्टेयर शासकीय भूमि पर नारायण प्रसाद के पिता बिसराम वर्षों से खेती कर रहे थे। 30 मई 1988 को तत्कालीन नायब तहसीलदार ने उनके कब्जे को दर्ज किया था। बाद में पिता के निधन के बाद नारायण प्रसाद ने भी उसी भूमि पर खेती जारी रखी।
विवाद वर्ष 2001 में तब शुरू हुआ, जब ग्राम पंचायत ने जमीन पर हस्तक्षेप करते हुए पेड़ों की कटाई का प्रयास किया। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा और समय के साथ हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट तक भी कानूनी प्रक्रिया चली। बाद में दायर नए वाद पर अपीलीय अदालत ने सभी साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए वादी के पक्ष में फैसला सुनाया।
अदालत ने माना कि वादी ने साक्ष्यों के आधार पर सरकारी भूमि पर तीन दशक से अधिक समय तक खुले, शांतिपूर्ण और निर्बाध कब्जे को साबित कर दिया है। ऐसे में प्रतिकूल कब्जा (एडवर्स पजेशन) के सिद्धांत के तहत वह भूमि के स्वामित्व का अधिकार प्राप्त कर चुका है। अदालत ने सिविल जज, बिलासपुर द्वारा 3 अगस्त 2023 को दिए गए उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें स्वामित्व की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा संबंधी वाद खारिज कर दिया गया था।
अदालत ने क्या कहा
जिला न्यायाधीश ने माना कि वादी ने साक्ष्यों से साबित कर दिया कि उसने खुले, शांतिपूर्ण और निर्बाध रूप से 30 साल से अधिक समय तक कब्जा रखा।
जिला न्यायाधीश ने अपने निर्णय में कहा कि निचली अदालत ने यह मानकर गलती की थी कि वादी को वर्ष 1988 से पहले के कब्जे का भी अलग से प्रमाण देना आवश्यक था। जबकि नायब तहसीलदार का आदेश और उसके बाद के राजस्व अभिलेख स्वयं कब्जे की आधिकारिक पुष्टि करते हैं। अदालत ने माना कि वादी के निरंतर कब्जे से जुड़े मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का राज्य शासन प्रभावी ढंग से खंडन नहीं कर सका।
निर्णय में कहा गया कि 30 मई 1988 से 12 मई 2022 तक, यानी 33 वर्ष 11 माह से अधिक समय तक भूमि पर लगातार कब्जा रहा, जो सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे का दावा स्थापित करने के लिए निर्धारित 30 वर्ष की अवधि से अधिक है।
अदालत ने राज्य शासन और उसके अधिकारियों-कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वे वादी के शांतिपूर्ण कब्जे में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करें। साथ ही स्पष्ट किया कि विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना उसे भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने राजस्व अभिलेखों में वादी का नाम दर्ज करने के आदेश का भी उल्लेख किया।
प्रतिकूल कब्जा क्या है
कानून के अनुसार अगर कोई व्यक्ति सरकारी जमीन पर 30 साल तक बिना रोक-टोक खेती-कब्जा करता है और सरकार विरोध नहीं करती, तो उसे उस जमीन पर स्वामित्व का अधिकार मिल सकता है।


