A plate of traditional Indian Poha garnished with fresh coriander, pomegranate seeds, and Sev next to a bowl of Jalebi.
Traditional Poha served with Sev and Jalebi, showcasing the popular Indian breakfast dish.

History of Poha: भारत में सुबह के नाश्ते में सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला पोहा असल में इंदौर या मध्य प्रदेश की खोज नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक संबंध महाराष्ट्र और हमारी प्राचीन संस्कृति से रहा है। हाल ही में खाद्य इतिहासकारों और सांस्कृतिक शोधकर्ताओं की जानकारियों से यह साफ हुआ है कि जिस इंदौरी पोहे को जीआई टैग दिलाने की बातें होती रही हैं, उसकी जड़ें महाराष्ट्र के खान-पान और होलकर राजवंश के इतिहास से जुड़ी हुई हैं।

पोहे का इतिहास बेहद प्राचीन माना जाता है और इसका जिक्र पुराने ग्रंथों में भी मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में जब सुदामा अपने मित्र भगवान श्री कृष्ण से मिलने पहुंचे थे, तब वे उपहार के रूप में चिड़वा यानी पोहा ही लेकर गए थे। ऐतिहासिक रूप से आधुनिक समय में पोहा सबसे पहले महाराष्ट्र के नागपुर क्षेत्र में लोकप्रिय हुआ। वहां खेतों में काम करने वाले किसान कम समय में तैयार होने वाले इस सुपाच्य भोजन को काफी पसंद करते थे।

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महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक पोहे का सफर

महाराष्ट्र में पोहे की मुख्य रूप से 4 अलग वैरायटी प्रचलित हैं, जिनमें प्याज के साथ बनने वाला कांदे पोहे, आलू के साथ बनने वाला बटाटा पोहे, दही के साथ दडपे पोहे और तीखी चने की तरी के साथ परोसा जाने वाला तर्री पोहे शामिल हैं। जब 18वीं सदी में होलकर और सिंधिया राजवंश के शासकों का प्रभाव बढ़ा, तो वे महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश के इंदौर और ग्वालियर क्षेत्र पहुंचे। इस प्रवास के साथ ही कांदे पोहे और श्रीखंड जैसे व्यंजन भी मध्य प्रदेश के खान-पान का मुख्य हिस्सा बन गए।

पोहा और जलेबी का अनोखा मिलाप

खान-पान के विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश में पहुंचकर पोहे का रूप और स्वाद बदल गया। इंदौर के लोगों ने महाराष्ट्र के नमकीन पोहे के साथ स्थानीय नमकीन सेव और मीठी जलेबी को जोड़कर एक नया कॉम्बिनेशन तैयार किया। इंदौर के वरिष्ठ शेफ और भोजन विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही पोहे की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई हो, लेकिन इसे सुबह के नाश्ते के रूप में वैश्विक पहचान दिलाने और हर गली-नुक्कड़ तक पहुंचाने में इंदौर का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

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सांस्कृतिक महत्व

आज पोहा केवल एक व्यंजन नहीं बल्कि देश के करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन और खान-पान उद्योग का एक बड़ा जरिया बन चुका है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में रोज सुबह हजारों स्टॉल पर पोहे की बिक्री से स्थानीय छोटे कारोबारियों को रोजगार मिलता है। पोहे के पौराणिक और ऐतिहासिक उद्गम की जानकारी मिलने से देश के स्ट्रीट फूड कल्चर को एक नई पहचान मिलती है और भोजन प्रेमियों के बीच इसके विभिन्न रूपों को जानने की उत्सुकता बढ़ती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

  1. पोहा मूल रूप से किस राज्य की डिश है?
    पोहा मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य का पारंपरिक व्यंजन है, जो बाद में होलकर शासन के दौरान मध्य प्रदेश पहुंचा।
  2. प्राचीन काल में पोहे को किस नाम से जाना जाता था?
    प्राचीन काल और ग्रंथों में पोहे को चिपिटा, चिड़वा या चिवड़ा के नाम से जाना जाता था।
  3. महाराष्ट्र में पोहे की कितनी प्रमुख वैरायटी मिलती हैं?
    महाराष्ट्र में पोहे की 4 मुख्य वैरायटी मिलती हैं: कांदे पोहे, बटाटा पोहे, दडपे पोहे और तर्री पोहे।
  4. इंदौर में पोहा जलेबी का ट्रेंड कैसे शुरू हुआ?
    इंदौर में लोगों ने महाराष्ट्र से आए नमकीन पोहे के साथ इंदौरी सेव और मीठी जलेबी को मिलाकर एक नया स्वादिष्ट कॉम्बिनेशन बनाया।
  5. क्या इंदौरी पोहे को जीआई टैग मिला हुआ है?
    इंदौरी पोहे को जीआई टैग दिलाने के प्रयास काफी समय से चल रहे हैं, लेकिन इसकी ऐतिहासिक शुरुआत महाराष्ट्र से मानी जाती है।
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