Commonwealth Games 2026: स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 74 देशों के 3000 से ज्यादा खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं, जहां 10 खेलों के 215 गोल्ड सहित कुल 1168 मेडल दांव पर लगे हैं। इस महाकुंभ में भारत सहित दुनिया भर के मुक्केबाज रिंग में मेडल के लिए अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। हालांकि, मुक्केबाजी प्रतियोगिता की एक बेहद अनोखी बात दर्शकों का ध्यान खींच रही है कि इसमें तीसरे स्थान यानी ब्रॉन्ज मेडल के लिए अलग से कोई प्लेऑफ मैच नहीं खेला जाता। नियम के मुताबिक, सेमीफाइनल मुकाबले में हारने वाले दोनों ही एथलीट्स को सीधे ब्रॉन्ज मेडल से सम्मानित किया जाता है।
बॉक्सिंग एक सीधा प्रहार वाला कॉम्बैट खेल है, जिसमें मुक्केबाजों के शरीर और सिर पर लगातार कड़े वार होते हैं। सेमीफाइनल स्टेज तक पहुंचने के लिए एक मुक्केबाज पहले ही रिंग में दो से तीन कड़े मुकाबले लड़ चुका होता है। लगातार फाइट के चलते खिलाड़ियों को अत्यधिक शारीरिक थकान, मांसपेशियों में खिंचाव और चेहरे व सिर पर गहरी चोटें आने का खतरा बना रहता है। यदि सेमीफाइनल में हारने वाले दो चोटिल मुक्केबाजों के बीच तुरंत तीसरे स्थान के लिए मैच कराया जाए, तो उन्हें उबरने का बिल्कुल समय नहीं मिलेगा। ऐसी कमजोर स्थिति में दोबारा रिंग में उतरने से खिलाड़ियों को जानलेवा चोट लगने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
ये भी है एक वजह
कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक जैसे वैश्विक आयोजनों में बॉक्सिंग का शेड्यूल काफी सख्त और व्यस्त होता है। सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबलों के बीच महज एक या दो दिनों का अंतर रखा जाता है। इतने कम समय में किसी भी मुक्केबाज के लिए कट, सूजन और अंदरूनी चोटों से पूरी तरह रिकवर होना व्यावहारिक रूप से असंभव होता है। खेल प्रेमियों और मेडिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि ब्रॉन्ज मेडल मैच आयोजित कराया जाए तो अक्सर कोई न कोई खिलाड़ी मेडिकल अनफिट घोषित होकर वॉकओवर देने पर मजबूर हो जाएगा, जिससे खेल की साख भी प्रभावित होती है।
1952 के हेलसिंकी ओलंपिक से शुरू हुई यह परंपरा
अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी में दो ब्रॉन्ज मेडल देने का यह ऐतिहासिक नियम साल 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक से लागू किया गया था। 1952 से पहले के टूर्नामेंट्स में तीसरे स्थान के लिए अलग से मैच आयोजित किए जाते थे, लेकिन मुक्केबाजों के गिरते स्वास्थ्य और गंभीर चोटों के मामलों को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (AIBA) ने प्लेऑफ मैच को हमेशा के लिए समाप्त करने का क्रांतिकारी फैसला लिया। बाद में इस मानवीय और वैज्ञानिक नियम को कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में भी पूरी तरह लागू कर दिया गया।
क्या है कारण ?
एथलीट्स की भलाई किसी भी पदक से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ के दिशानिर्देशों के अनुसार, मुक्केबाजी में एक खिलाड़ी का स्वास्थ्य ही उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। सेमीफाइनल तक पहुंचने की यात्रा ही अपने आप में असाधारण मेहनत को दर्शाती है। इसलिए सेमीफाइनल में हारने वाले दोनों खिलाड़ियों को ब्रॉन्ज मेडल देकर उनकी मेहनत और निष्ठा को समान रूप से सम्मानित किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मुक्केबाजी में ब्रॉन्ज मेडल मैच होता है?
उत्तर: नहीं, कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मुक्केबाजी में ब्रॉन्ज मेडल के लिए अलग से कोई प्लेऑफ मैच नहीं होता है।
Q. मुक्केबाजी में सेमीफाइनल हारने वाले खिलाड़ियों को कौन सा मेडल दिया जाता है?
उत्तर: मुक्केबाजी में सेमीफाइनल हारने वाले दोनों खिलाड़ियों को संयुक्त रूप से ब्रॉन्ज मेडल दिया जाता है।
Q. बॉक्सिंग में दो ब्रॉन्ज मेडल देने का नियम कब लागू हुआ था?
उत्तर: यह नियम सबसे पहले 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में लागू किया गया था और बाद में इसे सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनाया गया।
Q. ब्रॉन्ज मेडल मैच न कराने के पीछे मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: मुक्केबाजों को गंभीर चोटों, मांसपेशियों के खिंचाव और अत्यधिक थकान से बचाना इसका मुख्य कारण है।
Q. क्या यह नियम एशियन गेम्स और ओलंपिक में भी लागू होता है?
उत्तर: हां, ओलंपिक, एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी आयोजनों में यह नियम समान रूप से लागू होता है।


