CG News: छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने आम ग्राहकों और बीमाधारकों के हक में एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाते हुए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा के उस पुराने आदेश को पूरी तरह से बरकरार रखा है, जिसमें पीड़ित परिवार को बीमा दावे की राशि देने का निर्देश दिया गया था। राज्य आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि गंभीर बीमारी का पता चलने के बाद बीमित व्यक्ति के कम से कम 28 दिन तक जीवित रहने की शर्त पूरी तरह से उपभोक्ताओं के अधिकारों के खिलाफ और अन्यायपूर्ण है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 48 का हवाला देते हुए आयोग ने इसे अनुचित अनुबंध करार दिया और बीमा कंपनी की दलीलों को अमान्य ठहरा दिया।
यह विवाद अनीता सिंह और एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के बीच का है। शिकायतकर्ता अनीता सिंह के पति अभय राज सिंह ने समूह बीमा योजना के तहत पॉलिसी ली थी। पति के आकस्मिक निधन के बाद जब पीड़िता ने लगभग 10 लाख रुपये के बीमा दावे का भुगतान मांगा, तो कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि बीमित व्यक्ति बीमारी के निदान के बाद 28 दिनों तक जीवित नहीं रहे। इसके अलावा, बैंक की स्थानीय शाखा ने बिना पूर्व सूचना और वैध कारण के पीड़िता के बचत खाते पर रोक लगा दी, जिससे वे अपनी मासिक पेंशन और जमा पूंजी का इस्तेमाल नहीं कर सकीं। सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने सर्वोच्च अदालत के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अनुबंध की शर्तें दोनों पक्षों पर समान रूप से बाध्यकारी होती हैं, जबकि बैंक ने खाता फ्रीज करने के आरोपों को निराधार बताया।
कंपनी की दलील को क्यों किया गया निरस्त?
बीमा क्षेत्र में वर्षों से कई कंपनियां सूक्ष्म शर्तों (Fine Print) का सहारा लेकर उपभोक्ताओं के दावों को निरस्त करती रही हैं। पहले के मामलों में भी कई बार क्लेम रिजेक्शन के ऐसे पेचीदा आधार सामने आए हैं। हालांकि, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद से कानूनों में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि यदि कोई भी शर्त उपभोक्ता पर एकतरफा या अनुचित दबाव डालती है, तो उसे कानूनी रूप से अमान्य माना जाएगा। इस मामले में भी इसी कानूनी आधार का उपयोग करते हुए कंपनी की दलील को निरस्त किया गया है।
न्यायिक पीठ का आदेश
राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गौतम चौरड़िया और सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की पीठ ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। आयोग की पीठ ने अपने आधिकारिक आदेश में कहा, बीमारी का पता चलने के 28 दिन तक जीवित रहने की अनिवार्य शर्त बीमा अनुबंध के मूल उद्देश्य के ही पूरी तरह विपरीत है। यदि किसी गंभीर बीमारी के निदान के तुरंत बाद बीमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और केवल समय-सीमा का हवाला देकर दावा खारिज किया जाता है, तो बीमा सुरक्षा प्रदान करने का वास्तविक औचित्य ही समाप्त हो जाता है। यह शर्त उपभोक्ता पर अनुचित दायित्व डालती है।” आयोग ने यह भी माना कि बिना किसी लिखित सूचना के ग्राहक का बैंक खाता रोकना सेवा में सीधी लापरवाही है।
आगे क्या पड़ेगा प्रभाव ?
आयोग के इस दूरगामी निर्णय का सीधा लाभ प्रदेश और देश भर के उन लाखों बीमाधारकों को मिलेगा, जो अक्सर बीमा कंपनियों की जटिल और अनुचित शर्तों के कारण अपने हक के पैसों से वंचित रह जाते हैं। इस फैसले से बीमा कंपनियों पर अपनी पॉलिसी शर्तों को अधिक पारदर्शी, तर्कसंगत और ग्राहक-अनुकूल बनाने का नैतिक व कानूनी दबाव बनेगा। इसके साथ ही, वित्तीय और बैंकिंग संस्थानों को भी यह स्पष्ट संदेश मिला है कि बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए किसी भी नागरिक की जमा पूंजी या खाते को फ्रीज करना कानूनी रूप से भारी पड़ सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस की अपील क्यों खारिज की?
उत्तर: आयोग ने बीमा पॉलिसी में बीमारी का पता चलने के 28 दिन बाद तक जीवित रहने की शर्त को उपभोक्ता अधिकारों के खिलाफ और अनुचित माना, इसलिए अपील खारिज कर दी गई।
Q. यह मामला किस उपभोक्ता आयोग से शुरू हुआ था?
उत्तर: यह मामला जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, कोरबा से शुरू हुआ था, जहां शिकायतकर्ता अनीता सिंह ने याचिका दायर की थी।
Q. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 48 क्या प्रावधान करती है?
उत्तर: यह धारा उन अनुबंधों या शर्तों को अनुचित और अमान्य घोषित करने का अधिकार देती है जो उपभोक्ताओं पर एकतरफा, हानिकारक या अनुचित बोझ डालती हैं।
Q. बैंक खाता फ्रीज करने को लेकर आयोग ने क्या टिप्पणी की?
उत्तर: आयोग ने बिना किसी वैध कारण और पूर्व सूचना के ग्राहक का बैंक खाता रोकने को बैंक की गंभीर लापरवाही और सेवा में कमी माना।
Q. इस फैसले से आम बीमाधारकों को क्या फायदा होगा?
उत्तर: इस फैसले से बीमा कंपनियां भविष्य में पेचीदा और अनुचित शर्तों का बहाना बनाकर वैध क्लेम खारिज नहीं कर सकेंगी, जिससे ग्राहकों के हित सुरक्षित रहेंगे।


