Jana Gana Mana Controversy: भारत के राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद आज भी इतिहास के पन्नों में चर्चा का विषय बना रहता है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित इस गीत को लेकर अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि क्या यह ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में लिखा गया था? ऐतिहासक तथ्यों, आधिकारिक पत्रों और टैगोर के स्वयं के कथनों की पड़ताल करने पर यह साफ हो जाता है कि यह दावा पूरी तरह से भ्रामक और गलतफहमी का नतीजा है। गुरुदेव टैगोर ने स्पष्ट किया था कि ‘भारत भाग्य विधाता’ शब्द किसी सांसारिक शासक के लिए नहीं, बल्कि उस ईश्वर और परम चेतना के लिए उपयोग किया गया था जो देश के भाग्य का संचालन करती है।
दिसंबर 1911 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दौरान ‘भारत भाग्यो बिधाता’ शीर्षक से रचित इस गीत को पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया था। उसी दौरान ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम के भारत आगमन और दिल्ली दरबार के आयोजन का समय भी वही था। अधिवेशन के एक ही सत्र में टैगोर का यह भक्तिपूर्ण और देश-प्रेम से ओत-प्रोत गीत भी प्रस्तुत हुआ और कुछ अन्य नेताओं द्वारा सम्राट के स्वागत के अलग पद भी पढ़े गए। उस दौर के कुछ अंग्रेजी अखबारों ने रिपोर्टिंग में भारी चूक करते हुए दोनों घटनाओं को आपस में जोड़ दिया और यह गलत धारणा फैला दी कि टैगोर का गीत ब्रिटिश सम्राट के सम्मान में था।
1911 के कांग्रेस अधिवेशन में क्या हुआ ?
वर्ष 1911 का समय भारत के औपनिवेशिक इतिहास में काफी उथल-पुथल भरा था। एक ओर जहां बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा हुई थी, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही थी। गुरुदेव टैगोर ने मूल रूप से यह गीत संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में एक ब्रह्मो-गीत के रूप में लिखा था। इसमें भारत के विविध प्राकृतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों जैसे पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल और बंग का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय अखंडता की वंदना की गई थी। बाद में 24 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने इसके पहले अंतरे को राष्ट्रगान के रूप में आधिकारिक मान्यता दी थी।
पत्र में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने क्या कहा ?
इस विवाद से आहत होकर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 1937 में लिखे अपने एक पत्र में पूरी स्थिति साफ की थी। उन्होंने लिखा था कि ब्रिटिश राज के एक अधिकारी ने उनसे राजा के स्वागत में गीत रचने का अनुरोध किया था, जिसे उन्होंने साफ नकार दिया था। उसी प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने ईश्वर को साक्षी मानकर ‘भारत भाग्य विधाता’ की रचना की। टैगोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वह विधाता कोई जॉर्ज पंचम या षष्ठम नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि 1919 के दर्दनाक जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि ब्रिटिश वायसराय को लौटा दी थी, जो उनके अटूट राष्ट्रप्रेम और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति विरोध को साबित करता है।
‘अधिनायक’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है ?
भाषा और साहित्य के जानकारों के अनुसार, गीत में प्रयुक्त ‘अधिनायक’ शब्द का गलत अर्थ निकालने के कारण भी भ्रम गहराया। राजनीतिक संदर्भों में अधिनायक का अर्थ भले ही शासक या तानाशाही से लगाया जाता हो, लेकिन रवींद्र साहित्य में यह मानव चेतना के पथ-प्रदर्शक और परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। टैगोर की दार्शनिक सोच संकीर्ण राष्ट्रवाद से परे संपूर्ण मानवता और नैतिक आजादी की पक्षधर थी। ‘जन-गण-मन’ भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं को एक सूत्र में पिरोने वाला वो मंत्र है, जो गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर एक महान भारत की कल्पना करता है।
क्यों बार-बार होती है चर्चा ?
आधुनिक दौर में भी जब-तब सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में इस विवाद को नए सिरे से उछालने की कोशिश की जाती है। हालांकि, देश के इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह के दुष्प्रचार केवल ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी न होने के कारण फलते-फूलते हैं। भारत का राष्ट्रगान देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता का प्रतीक है, और ऐतिहासिक साक्ष्यों के प्रकाश में इसकी गरिमा सदैव अक्षुण्ण बनी रहेगी।


