Operation Sindoor impact on Pakistan nuclear deterrence and military strategy
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की परमाणु रणनीति और पारंपरिक सैन्य क्षमता को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में अहम दावे किए गए हैं।

Bulletin of the Atomic Scientists Report: मई 2025 में भारत के साथ सैन्य टकराव के बाद पाकिस्तान की रणनीतिक सोच में बदलाव के संकेत मिले हैं। अमेरिका के Bulletin of the Atomic Scientists की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के अनुभव ने उसके परमाणु प्रतिरोध की सीमाएं उजागर कीं। रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद पाकिस्तान अब परमाणु हथियारों के प्रदर्शन के बजाय अपनी पारंपरिक सैन्य क्षमता मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रहा है।

यह सैन्य टकराव दक्षिण कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले के जवाब में भारत की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संघर्ष ने पाकिस्तान के रणनीतिक प्रतिष्ठान के सामने यह सवाल खड़ा किया कि परमाणु हथियार वास्तव में संकट के दौरान कितनी सुरक्षा दे सकते हैं।

परमाणु हथियार भारत को रोक नहीं पाए: रिपोर्ट

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के परमाणु हथियार मई 2025 के टकराव को रोकने में कामयाब नहीं रहे। वे भारत को पाकिस्तान के भीतर सैन्य कार्रवाई करने से भी नहीं रोक सके और संकट के दौरान इस्लामाबाद को कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दे पाए। रिपोर्ट में पाकिस्तान की फुल-स्पेक्ट्रम डिटॉरेंस की रणनीति पर भी सवाल उठाए गए हैं। इस रणनीति के तहत यह माना जाता रहा है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता विभिन्न स्तरों के सैन्य हमलों को रोकने में सक्षम है।

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मई 2026 में बदला नजर आया सुरक्षा नैरेटिव

रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 के सैन्य टकराव की पहली वर्षगांठ और मई 1998 के परमाणु परीक्षणों की वर्षगांठ के दौरान पाकिस्तान के आधिकारिक सुरक्षा नैरेटिव में बदलाव दिखाई दिया। मई 2026 में पाकिस्तान में मार्का-ए-हक को प्रमुखता दी गई, जबकि यौम-ए-तकबीर को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला। यौम-ए-तकबीर को पाकिस्तान 1998 के परमाणु परीक्षणों की याद में मनाता है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेताओं ने भी इस मौके पर केवल सोशल मीडिया के जरिए संक्षिप्त संदेश दिए। पार्टी ऐतिहासिक रूप से 1998 के परमाणु परीक्षणों का श्रेय लेती रही है।

पारंपरिक सैन्य ताकत पर बढ़ा जोर

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में सार्वजनिक पोस्टरों और अभियानों में पारंपरिक सैन्य सफलताओं और सेना के नेतृत्व को ज्यादा प्रमुखता दी गई। इसके उलट परमाणु हथियार और मिसाइलें इन अभियानों में कम दिखाई दीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे पाकिस्तान की सेना के राजनीतिक हित भी जुड़े हो सकते हैं। पारंपरिक सैन्य उपलब्धियां जनता के सामने सेना की ताकत और भूमिका को ज्यादा सीधे तौर पर दिखाती हैं। इसी दिशा में पाकिस्तान ने अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है और एक नई आर्मी रॉकेट फोर्स कमान स्थापित की है।

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ऑपरेशन सिंदूर ने फुल-स्पेक्ट्रम डिटॉरेंस पर उठाए सवाल

रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 9 आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इसके बाद पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई के जवाब में भारत ने 11 पाकिस्तानी एयरबेसों पर हमले किए। रिपोर्ट का तर्क है कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी भारत को पाकिस्तान के भीतर सैन्य कार्रवाई करने से नहीं रोक सकी। इससे पाकिस्तान की उस रणनीति पर सवाल उठे, जिसमें परमाणु क्षमता को व्यापक सैन्य प्रतिरोध के तौर पर देखा जाता है।

परमाणु हथियारों ने बढ़ाया संकट का जोखिम?

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि परमाणु हथियार संकट के दौरान समाधान देने के बजाय अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान के सामने यह चुनौती थी कि वह पारंपरिक सैन्य जवाब कैसे दे, क्योंकि किसी भी पारंपरिक मिसाइल के परीक्षण या प्रक्षेपण को भारत परमाणु हमले की शुरुआत के तौर पर देख सकता था। ऐसे में पाकिस्तान के लिए जवाबी कार्रवाई और संभावित गलतफहमी के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता था। टकराव के अंतिम चरण में पाकिस्तान के नेशनल कमांड अथॉरिटी की बैठक बुलाए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत था कि संकट किस स्तर तक पहुंच गया था। बाद में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हस्तक्षेप के जरिए स्थिति को और बिगड़ने से रोकने की कोशिश हुई और युद्धविराम लागू हुआ।

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परमाणु हथियारों की होड़ वाले देशों के लिए क्या सबक?

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान का अनुभव यह दिखाता है कि परमाणु हथियार सुरक्षा की हर चुनौती का सार्वभौमिक समाधान नहीं हैं। परमाणु क्षमता सैन्य प्रतिरोध की ताकत बढ़ा सकती है, लेकिन इसके साथ संकट के दौरान गलत आकलन और अनपेक्षित बढ़ोतरी का जोखिम भी जुड़ा रहता है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जो देश परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें केवल इनके सुरक्षा लाभों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उन्हें यह भी समझना होगा कि परमाणु हथियार किस तरह सैन्य विकल्पों को सीमित कर सकते हैं और संकट के दौरान नए जोखिम पैदा कर सकते हैं।