जिसकी शहनाई की धुन पर खुलता था बाबा विश्वनाथ का पट, भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि आज

बनारस। शहनाई की मधुर आवाज से लोकप्रसिद्ध भारत रत्न बिस्मिल्ला खां की आज पुण्यतिथि है। बनारस की सुबह में अपनी सांसों को आवाज बनाकर शहनाई के  जरिए रंग भरने वाले बिस्मिल्लाह को गंगा का किनारा आज भी ढूंढता है। उस्ताद की दत्तक पुत्री पद्मश्री सोमा घोष ने बताया कि बाबा को बाबा विश्वनाथ में उनकी गहरी आस्था थी।

नजीर बनारसी का शेरसोएंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर-कर के। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां पर नजीर की यह शायरी बेहद सटीक बैठती है।न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां गंगा को अपनी मां मानते थे और कहते थे कि गंगा में स्नान करना हमारे लिए उतना ही जरूरी है, जितना की उनका शहनाई बजाना। सर्दी, गर्मी, बरसात चाहे कैसा भी मौसम हो उस्ताद को बिना गंगा में नहाए तो सुकून ही नहीं मिलता था। सुबह-ए-बनारस में शहनाई का जो रस घुलता था वह उस्ताद के जाने के साथ ही खामोश हो गया। बनारस की उत्सवी सुबह में अपनी सांसों को आवाज बनाकर शहनाई के  जरिए रंग भरने वाले बिस्मिल्लाह को गंगा का किनारा आज भी याद करता है। उस्ताद की दत्तक पुत्री पद्मश्री सोमा घोष ने बताया कि बाबा को बाबा विश्वनाथ में गहरी आस्था थी। बाबा तो कहते थे कि बाबा विश्वनाथ तो उन्हें महसूस भी होते हैं।

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उस्ताद बिस्मिल्ला खां कहा करते थे कि हर रोज बाबा के मंदिर के पट हमारी शहनाई की आवाज सुनने के बाद खुलते हैं, जीवन में इससे ज्यादा और क्या चाहिए ? फिल्मों में भी उनकी शहनाई का जादू हर किसी के सिर चढ़कर बोलता है।

21 अगस्त 2006 यही वह तारीख है जब इस महान फनकार ने दुनिया से हमेशा के लिए अलविदा लिया था। शहनाई से उनके इश्क की दास्तां देखिए कि काशी की सांस्कृतिक विरासत के इस पुरोधा की कब्र में शहनाई भी दफनाई गई थी। 21 मार्च 1916 को बिहार में जन्मे कमरुद्दीन इस सांस्कृतिक नगरी काशी आकर बिस्मिल्ला खां बने और अपने हुनर की बदौलत पूरी दुनिया में ‘उस्ताद’ की उपाधि कमाया। 

कहीं न कहीं बनारस का रस तो टपकेगा ही – बिस्मिल्ला खां

बिस्मिल्ला खां के पोते नासिर व परपोते आफाक हैदर ने बताया कि आज भी कोशिश है कि दादा की शहनाई की परंपरा को जीवित रख सकें। दादा कहते थे कि बनारस का ही कमाल है जिसने उनकी शहनाई के सुरों में मिठास घोली थी। दादा जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महाल में रियाज करते जवान हुए हैं तो कहीं न कहीं बनारस का रस तो टपकेगा ही हमारी शहनाई से। तबलावादक पं. पूरण महाराज ने बताया कि बिस्मिल्लाह खां ऐसे फनकार थे, जिन्होंने दुनिया के सामने बनारस को अपनी और खुद को बनारस की पहचान बनाकर पेश किया था।

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अमेरिका के ऑफर पर ऐसा जवाब

भारत रत्न के पोते नासिर ने बताया कि अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय ने उन्हें अपने यहां संगीत सिखाने का न्योता भिजवाया था। विश्वविद्यालय वालों का कहना था कि खान साहब को अकेलापन महसूस न हो इसके लिए वे अपने कुछ करीबियों को भी शिकागो बुला सकते हैं और उनके लिए भी रहने की व्यवस्था हो जाएगी। लेकिन दादा जान ने उन्हें ऐसा जवाब दिया जो हमेशा के लिए नजीर है। उनका कहना था ये तो सब कर लोगे। ठीक है मियां! लेकिन मेरी गंगा कहां से लाओगे।

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