टीआरपी डेस्क। तिरंगे के वर्तमान स्‍वरूप को 22 जुलाई 1947 को भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पहले की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में स्वीकार किया गया।

हमारे लिए तिरंगा बेहद महत्वपूर्ण और गौरव का विषय है। इस नाम के पीछे की वजह इसमें इस्तेमाल होने वाले केसरिया, सफेद और हरे रंग की पट्टी है और बीच में अशोक चक्र बना हुआ है। हालांकि, इससे पहले स्वतंत्रता के लिए जारी आंदोलनों में 1857 से लेकर 1947 तक क्रांतिकारियों ने 11 राष्ट्रीय ध्वजों को प्रतीक बनाकर उनके नेतृत्व में लड़ाइयां लड़ीं। आखिर में 1947 में तिरंगे को भारतीय ध्वज की मान्यता मिली।

10 बार बदला भारतीय झंडे का स्वरूप

  1. बहादुर शाह ज़फर का ध्वज

साल 1857 में पहली बार हिंदुस्तान में आजादी की संगठित लड़ाई लड़ी गई, जिसमें बहादुर शाह ज़फर ने यह झंड़ा फहराया था। सैनिकों की तरफ से हुए इस विद्रोह को अंग्रेजों ने बेरहमी से कुचल दिया था। भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान जो झंडा राष्ट्रीय ध्वज के रूप में इस्तेमाल किया गया था, वह कुछ ऐसा दिखता था। इसमें हरे रंग की पृष्ठभूमि में एक चांद और एक कमल का फूल बना हुआ था। हालंकि मुगल साम्राज्य के खत्मे के साथ-साथ इस झंड़े का अस्तित्व भी खत्म हो गया।

2. ब्रिटिश शासकों का भारतीय झंड़ा

1857 में सिपाही विद्रोह में जीत हासिल करने के बाद ब्रिटिश राज ने शाही शासन स्थापित किया और ब्रिटिश उपनिवेश ने भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक झंडा भी पेश किया। यह झंडा नीला था और इसके ऊपरी बाएं कोने पर यूनियन जैक और निचले दाएं कोने पर एक मुकुट से घिरा सितारा था।

3. भगिनी निवेदिता का ध्वज

साल 1904 से 1906 के बीच स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने एक ध्वज तैयार किया था। इसे बाद में सिस्टर निवेदिता के ध्वज के नाम से भी जाना जाने लगा था। इस झंडे में पीला और लाल दो रंग थे। लाल का मतलब स्वतंत्रता के लिए संघर्ष से था। वहीं पीला विजय का प्रतीक था। ध्वज पर बंगाली में ‘बोंदे मातोरम्’ (वंदे मातरम्) लिखा था। इसमें एक वज्र भी बना था, जो इंद्र का अस्त्र माना जाता है। यह देश की शक्ति का प्रतीक था। बीच के शस्त्र में एक कमल का आकार भी बना था, जिसे शुद्धता का प्रतीक बताया गया।

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4. सूर्य-चंद्र वाला कलकत्ता फ्लैग

साल 1906 में एक राष्ट्रीय ध्वज अस्तित्व में आया। इसमें तीन पट्टियां थीं, जिसके रंग क्रमशः हरा (शीर्ष पर), पीला (मध्य में) और लाल (नीचे) थे। सबसे ऊपर की पट्टी में 8 कमल के फूल बने थे। मध्य में देवनागरी में वंदे मातरम लिखा था और नीचे वाली पट्टी पर आधा चांद और सूर्य बनाए गए थे। इसे 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक कोलकाता में फहराया गया था।

5. भीकाजी कामा का झंडा

साल 1907 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में भीकाजी कामा ने कुछ निर्वासित क्रांतिकारियों के साथ यह ध्वज फहराया था। यह कलकत्ता फ्लैग जैसा ही दिखता था। बस सबसे ऊपर वाली पट्टी में कमल की जगह सितारे लगा दिए गए थे और नीचे की पट्टी लाल की जगह हरी कर दी गई थी। इसके अलावा आधा चांद के उपर एक सितारा भी लगा दिया गया था। बर्लिन के सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में भी इसे फहराया गया था, इसलिए इसे बर्लिन कमिटी फ्लैग भी कहा जाता है।

6. होमरूल फ्लैग

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने होमरूल लीग के साल 1917 में बनाए इस राष्ट्रीय ध्वज को फहराया था। उस समय में भारत को एक डोमिनियन स्टेट बनाने की मांग की जा रही थी। इस झंडे में ऊपर अंग्रेजों का ध्वज यूनियन जैक बना हुआ था। बाकी के झंडे में 5 लाल और चार हरे रंग की पट्टियां थीं। इनमें सात सितारे भी लगे थे, जो सप्तर्षियों के प्रतीक बताए गए। इसके एक कोने पर चांद-तारा भी बना हुआ था। यह झंडा लोगों में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ।

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7. विजयवाड़ा ध्वज

इस झंडे को 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया। इस झंडे में पहले 2 रंग थे। दोनों रंग 2 समुदायों हिंदू और मुस्लिम को प्रदर्शित करते थे। इस पर गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के बाकी समुदायों के प्रतिनिधित्व के लिए इसमें सफेद रंग की पट्टी भी जोड़ दी जाए। साथ ही राष्ट्र की प्रगति को दर्शाने के लिए एक चरखा भी लगा दिया जाए। बताते हैं कि यह झंडा आयरलैंड के झंडे से प्रेरित था, जो उस समय ब्रिटेन से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। हालांकि, कांग्रेस ने इस झंडे को मान्यता नहीं दी लेकिन यह भारत की आजादी की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में गिना जाता है।

8. कांग्रेस द्वारा अस्वीकार्य ध्वज (1931)

1931 में, जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की कराची में बैठक हुई, तो एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें एक ऐसे ध्वज की आवश्यकता पर बल दिया गया जो कांग्रेस को आधिकारिक रूप से स्वीकार्य हो। ध्वज में रंगों के महत्व को लेकर पहले से ही काफी विवाद था। सांप्रदायिक तनाव शुरू हो गया था। 2 प्रमुख समुदाय अलग-अलग रास्ते पर थे और सांप्रदायिक व्याख्या पर जोर दिया जा रहा था। इस बीच, ध्वज के चयन पर राय जानने के लिए सात सदस्यों की एक समिति गठित की गई। इसने एक सादे भगवा ध्वज का सुझाव दिया जिसके बाएं कोने में लाल-भूरे रंग का चरखा बना हो। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया। “वर्ष 1931 ध्वज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण वर्ष था। तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया था।”

9. पिंगाली वेंकैया का झंड़ा

झंड़े को लेकर कांग्रेस को विभिन्न धार्मिक समुदायों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। उनका मानना था कि हिंदू और इस्लाम को क्रमशः लाल और हरे रंग से अधिक महत्व दिया गया है। परिणामस्वरूप, स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने 1931 में महात्मा गांधी से अनुमती लेकर एक नया ध्वज डिज़ाइन किया। जिसमें लाल की बजाय केसरिया रंग था, जो हिंदू योगियों और मुस्लिम दरवेशों, दोनों का प्रतिनिधित्व करता था। बीच की सफेद पट्टी अन्य धर्मों का प्रतिनिधित्व करती थी और अंत में नीचे की ओर एक हरी पट्टी थी। सफेद पट्टी के बीच में एक चरखा था, जो स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था। यह भारत का पहला आधिकारिक ध्वज था।

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10. आजाद हिंद फौज का झंड़ा

आजाद हिन्द फौज का गठन पहली बार 1942 में हुआ। मूल रूप से उस वक्त यह आजाद हिन्द सरकार की सेना थी, जिसका लक्ष्य अंग्रेजों से लड़कर भारत को स्वतंत्रता दिलाना था। जब दक्षिण-पूर्वी एशिया में जापान के सहयोग से करीब 40,000 भारतियों की प्रशिक्षित सेना का गठन कर उन्हें आजाद हिन्द फौज नाम दिया तब भारत की आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ इस झंड़े का इस्तेमाल किया गया था।

11. आजादी और तिरंगा

सदियों के संघर्ष के बाद वह दिन भी आने वाला था, जब भारत को अंग्रेजों से पूरी तरह आजादी मिलने वाली थी। इस बीच 22 जुलाई 1947 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अगुआई में गठित कमिटी ने स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज को मान्यता दी। इस झंडे में तीन रंग केसरिया, हरा और सफेद बरकरार रखे गए। चरखे की जगह पर सम्राट अशोक के धर्मचक्र को स्थान दिया गया। इस तरह से स्वतंत्र भारत को उसका राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा मिला।

कुछ विशेषज्ञों का मानना यह भी है कि 22 जुलाई 1947 को नए राष्ट्रीय ध्वज को अपनाने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि चरखे वाला राष्ट्रीय ध्वज ध्वज आगे और पीछे से देखने पर अलग-अलग दिखाई देता था। विपरीत दिशा से देखने पर चरखा उलटा नजर आता था। जो राष्ट्रीय ध्वज को बदलने का एक बड़ा कारण बना।