बिलासपुर हाईकोर्ट भवन की बाहरी तस्वीर और कानूनी न्याय का प्रतीक
बिलासपुर हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार कानून के तहत जुर्माने की प्रक्रिया पर बड़ा आदेश जारी किया है।

टीआरपी डेस्क। छत्तीसगढ़ में पूरी तरह रोक होने के बाद भी धड़ल्ले से पॉलिथीन और डिस्पोजेबल कप-ग्लास बिक रहे हैं। इस बात पर अब बिलासपुर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपना लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने सरकार को जमकर फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ पूछा कि जब नियम बने हैं, तो ये कचरा बाजार में आ कहां से रहा है?

मुख्य सचिव को देना होगा हलफनामा

हाईकोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने अब राज्य के मुख्य सचिव को खुद मैदान में उतरने को कहा है। उन्हें कोर्ट में शपथ पत्र (हलफनामा) देकर जवाब देना होगा। सरकार को बताना पड़ेगा कि रोक के बाद भी अफसर क्या कर रहे थे। मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई को तय की गई है। तब तक सरकार को पूरा हिसाब देना होगा।

यह पूरा मामला पार्यावरण एक्टिविस्ट नितिन सिंघवी की याचिका के बाद सामने आया है। नितिन ने कोर्ट को बताया कि राज्य में कहने को तो सब बंद है। डिस्पोजेबल प्लेट, चम्मच, स्ट्रॉ, थर्मोकॉल और छोटी पानी बोतलों पर कागजों में ताला लगा है। लेकिन धरातल पर सच कुछ और है। रायपुर के जयस्तंभ चौक से लेकर छोटे-मोटे बाजारों तक में यह सामान आसानी से मिल रहा है। त्योहारों और शादियों में तो इनका खुलकर इस्तेमाल हो रहा है।

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छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई से काम नहीं चलेगा

याचिका में साफ कहा गया है कि नगर निगम के अमले सिर्फ गरीब ठेले वालों और छोटे दुकानदारों पर फाइन ठोककर पल्ला झाड़ लेते हैं। इससे यह धंधा बंद नहीं होने वाला। अगर सच में प्लास्टिक मुक्त छत्तीसगढ़ बनाना है, तो बड़े सप्लायरों को दबोचना होगा। जो लोग ट्रकों में माल भरकर ला रहे हैं, उन्हें बॉर्डर पर ही रोकना पड़ेगा।

फैक्ट्रियों की बिजली और जीएसटी खंगालने की मांग

अब इस खेल को रोकने के लिए नया प्लान तैयार किया गया है। कोर्ट से मांग की गई है कि संदिग्ध प्लास्टिक फैक्ट्रियों की बिजली खपत की जांच हो। अगर फैक्ट्री बंद है, तो बिजली का बिल ज्यादा कैसे आ रहा है? इसके साथ ही उनके जीएसटी (GST) रिकॉर्ड को भी खंगाला जाए। होटलों और ऑनलाइन फूड डिलीवरी में जो पैकिंग आ रही है, उसकी भी जांच होनी चाहिए। अब देखना होगा कि 8 जुलाई को सरकार कोर्ट में क्या जवाब देती है।

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पर्यावरण संरक्षण मंडल की सुस्ती पर सवाल

हैरानी की बात यह है कि नवंबर 2025 में ही आवास और पर्यावरण विभाग ने छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को एक उच्च स्तरीय समिति बनाने का आदेश दिया था। लेकिन अब तक मंडल की ओर से कोई ठोस प्रस्ताव शासन को नहीं भेजा गया। यह सरकारी तंत्र की उस सुस्ती को दर्शाता है, जिसका फायदा उठाकर प्लास्टिक माफिया चांदी काट रहा है।

ऑनलाइन और फूड डिलीवरी की आड़

याचिका में एक और गंभीर मुद्दा उठाया गया है होटलों और ऑनलाइन फूड डिलीवरी सेवाओं द्वारा उपयोग की जा रही पैकेजिंग। कई बार नियमों में दी गई छूट का गलत फायदा उठाकर प्रतिबंधित सामग्री को भी बाजार में खपा दिया जाता है।

मुख्य सचिव को शपथ पत्र के माध्यम से जवाब देना होगा कि नियमों (प्लास्टिक रेगुलेशन एक्ट 2020 और नियम 2023) के होने के बावजूद यह अवैध धंधा कैसे चल रहा है। अगली सुनवाई 8 जुलाई को होनी तय है।

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गली-मोहल्ले के दुकानदारों से 500-1000 रुपये का चालान काटकर प्रदूषण मुक्त प्रदेश का सपना पूरा नहीं होगा। इस मामले में प्लास्टिक निर्माण करने वाली कंपनियों के खिलाफ सख्त एक्शन लेना होगा ताकि छत्तीसगढ़ इस जहरीले कचरे से मुक्त हो सके।