टीआरपी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बस्तर दौरे से ठीक पहले नक्सल हिंसा के पीड़ित परिवारों ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए सरकार से न्याय और पुनर्वास की गुहार लगाई है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि एक ओर सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए आकर्षक पैकेज दे रही है, वहीं दूसरी ओर वर्षों से दंश झेल रहे पीड़ितों को पुनर्वास नीति-2025 का उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
बस्तर में स्थायी शांति के लिए केवल नक्सलियों का आत्मसमर्पण काफी नहीं है, बल्कि हिंसा के शिकार हुए आम आदिवासियों और ग्रामीणों का पुनर्वास सबसे जरूरी कड़ी है। अगर जमीनी स्तर पर पीड़ितों को मुआवजा, रोजगार और पक्के मकान नहीं मिले, तो सुशासन का दावा अधूरा रहेगा और प्रभावित परिवारों में असंतोष और गहरा हो सकता है।
“सरेंडर नीति के साथ हमारी पीड़ा भी सुनिए”
नक्सल पीड़ित परिवार के सदस्य धीरेन्द्र साहू ने भावुक होते हुए कहा, “सरकार कहती है नक्सलवाद समाप्त हो रहा है, लेकिन हमारी पीड़ा अभी भी समाप्त नहीं हुई। अमित शाह जी बस्तर आ रहे हैं, वे हमारी भी सुनें। केवल सरेंडर करने वालों को रेड कार्पेट नहीं, बल्कि पीड़ितों को भी न्याय और सहारा चाहिए।”
पीड़ितों का कहना है कि नक्सलियों के हमलों में उनके परिजन मारे गए, घर जला दिए गए और खेती-किसानी छूट जाने से सैकड़ों परिवार विस्थापित हो गए, लेकिन मुआवजा, आवास, रोजगार और बच्चों की पढ़ाई जैसी मूलभूत सुविधाएं आज भी केवल कागजों तक ही सीमित हैं।
पीड़ित परिवारों की 6 प्रमुख मांगें
नक्सल हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को घोषित मुआवजे का शीघ्र भुगतान हो।
मृतकों के आश्रित परिजनों को तत्काल सरकारी नौकरी दी जाए।
क्षतिग्रस्त मकानों के बदले पक्का प्रधानमंत्री आवास और आवासीय जमीन उपलब्ध कराई जाए।
पीड़ित बच्चों को मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्ति और रोजगार प्रशिक्षण का लाभ मिले।
नक्सलियों की सरेंडर नीति की तर्ज पर ही एक मजबूत पीड़ित-केंद्रित पुनर्वास पैकेज तैयार किया जाए।
जिलों में पारदर्शी और तेज़ समीक्षा समिति बने ताकि लंबित मामलों का निपटारा समय पर हो सके।
सरकारी तंत्र और जमीनी हकीकत
छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि नक्सल प्रभावित जिलों में पुनर्वास नीति के तहत लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं और जिला कलेक्टर कार्यालयों में शिकायत निवारण तंत्र भी बनाया गया है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि जटिल दस्तावेजी प्रक्रिया, लालफीताशाही और पहुंच की कमी के कारण सैकड़ों परिवार आज भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। पीड़ितों का साफ कहना है कि शांति तभी सच्ची होगी जब पीड़ित भी मुख्यधारा में ससम्मान शामिल हो पाएंगे।
मुख्य चिंता: नक्सलियों के सरेंडर पैकेज के मुकाबले पीड़ितों के लिए पुनर्वास नीति-2025 के क्रियान्वयन में देरी।
प्रभावित क्षेत्र: बस्तर संभाग के सैकड़ों विस्थापित और पीड़ित परिवार।
प्रमुख मांग: मुआवजा, सरकारी नौकरी, पीएम आवास और बच्चों की मुफ्त शिक्षा की त्वरित व्यवस्था।
बस्तर के नक्सल पीड़ित परिवारों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से उनके दौरे के दौरान मुलाकात का समय मांगा है। पीड़ितों को उम्मीद है कि देश के गृहमंत्री इस संवेदनशील मुद्दे को गंभीरता से लेंगे और मैदानी स्तर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उन्हें उनका हक और न्याय दिलाएंगे।



