नारायणपुर। बरसों तक नक्सल हिंसा झेलने वाले अबूझमाड़ के अंदरूनी गांवों में अब बदलाव की बयार बह रही है। ओरछा ब्लॉक के तोके, घमंडी, नेलांगुर और हितावाडा जैसे संवेदनशील गांवों में ‘स्कूल केइंता’ यानी स्कूल बुलाओ अभियान रंग ला रहा है। नक्सल मुक्त बस्तर की नई तस्वीर में अब बच्चे बंदूक नहीं, किताब थामने को तैयार हैं।
आनंद मेला बना शिक्षा का जरिया
इन गांवों की 11 वैकल्पिक शालाओं में सामुदायिक आनंद मेला और समर कैंप चल रहे हैं। खास बात ये कि यहां सिर्फ बच्चे ही नहीं, उनके माता-पिता और बुजुर्ग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। मांदर, ढोल की थाप और ककसार लोकनृत्य के बीच बच्चे खेल-खेल में पढ़ाई से जुड़ रहे हैं।
हितावाडा गांव बना मिसाल
इसी कड़ी में हितावाडा में हुए कार्यक्रम में ग्रामीणों ने बड़ा फैसला लिया। बैठक कर परिजनों ने लिखित में सहमति दी कि वे अपने बच्चों को रोजाना स्कूल भेजेंगे। अगले शिक्षा सत्र में गांव के 10 बच्चों के शत-प्रतिशत नामांकन का प्रस्ताव भी रखा गया। ये बदलाव दिखाता है कि अबूझमाड़ के लोग अब शिक्षा का महत्व समझ रहे हैं।
परंपरा और पढ़ाई का संगम
आनंद मेले में बच्चों के लिए पेंटिंग, मिट्टी कला, कहानी लेखन और स्टोरी टेलिंग जैसी गतिविधियां कराई गईं। पारंपरिक आदिवासी संस्कृति को बचाते हुए आधुनिक शिक्षा को अपनाने का ये मजबूत संदेश है। बंदूक की गोलियों से थर्राने वाला अबूझमाड़ अब बच्चों की किलकारियों और स्कूल की घंटी से गूंज रहा है।’स्कूल केइंता’ अभियान नक्सल प्रभावित इलाकों में सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी का बड़ा उदाहरण बन रहा है। शिक्षा की ये अलख अबूझमाड़ का भविष्य बदलने जा रही है।


