बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के मामलों को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर परिवार के सभी सदस्यों को आपराधिक मुकदमे में घसीटना कानून का दुरुपयोग है। ठोस आरोप, स्पष्ट भूमिका और पर्याप्त साक्ष्य के बिना किसी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं है।

जानें, क्या है मामला ?

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रायपुर की एक महिला के केस की सुनवाई में की। महिला ने अपने पति जितेंद्र नंदे, सास शकुंतला नंदे और देवर राजेंद्र कुमार नंदे के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और आपराधिक न्यासभंग की FIR दर्ज कराई थी। आरोप था कि दो बेटियों के जन्म के बाद उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

निचली अदालत ने तय कर दिए आरोप, मगर हाईकोर्ट ने…

पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और निचली अदालत ने आरोप तय कर दिए। इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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सुनवाई में हाईकोर्ट ने FIR और चार्जशीट का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि दस्तावेजों में आरोपियों की भूमिका से जुड़ी कोई स्पष्ट घटना, तारीख, समय या विशिष्ट विवरण नहीं है। आरोप सामान्य हैं। यह नहीं बताया गया कि किसने कब और कैसे प्रताड़ित किया।

खंडपीठ ने कहा कि सिर्फ पति का रिश्तेदार होने से किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। आपराधिक केस में शामिल करने के लिए ठोस और विशिष्ट आरोप जरूरी हैं।

498A के दुरुपयोग पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हाल के वर्षों में IPC की धारा 498A का इस्तेमाल कई बार वैवाहिक विवादों में व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए भी हुआ है। कानून का मकसद असली पीड़ितों को न्याय दिलाना है, न कि बिना आधार पूरे परिवार को फंसाना।

कोर्ट ने कहा कि अगर आरोप स्पष्ट नहीं हैं और भूमिका तय नहीं होती, तो केस चलाना खुद उत्पीड़न है। नोटिस के बावजूद शिकायतकर्ता महिला कोर्ट में नहीं आई और न ही कोई अतिरिक्त सबूत दिया।

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FIR और केस रद्द

इन हालात को देखते हुए कोर्ट ने रायपुर महिला थाना की FIR, चार्जशीट और न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। हाई कोर्ट के इस फैसले ने दहेज प्रताड़ना के मामले में ससुराल वालों को बेवजह फंसाने वालों, पुलिस और न्यायविदों को बड़ा संदेश दे दिया है।