Chhattisgarh Noise Pollution Bill 2026: छत्तीसगढ़ कोलाहल नियंत्रण विधेयक, 2026 के प्रारूप पर पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाले रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने कई आपत्तियां और सुझाव दिए हैं। उन्होंने प्रमुख सचिव, गृह विभाग एवं पुलिस विभाग को सौंपे अपने सुझावों में कहा है कि प्रस्तावित कानून में कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जिनसे ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण प्रभावित हो सकता है। उन्होंने साइलेंस जोन की सीमा, डीजे बजाने की अनुमति, जुर्माने की राशि और जब्त उपकरणों के निपटारे से जुड़े नियमों में बदलाव की मांग की है।
यह प्रारूप छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका के मद्देनजर केंद्र के ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 और राज्य के कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985 के बीच असंगतियों को दूर करने के उद्देश्य से तैयार किए जाने की बात कही गई है। फिलहाल इस पर जनता से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।
हाईकोर्ट के आदेशों को विधेयक में शामिल करने की मांग
नितिन सिंघवी ने जनहित याचिका क्रमांक 112/2016 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 6 दिसंबर 2016 और 27 अप्रैल 2017 के आदेशों का हवाला दिया है। उनके अनुसार, इन आदेशों में वाहनों पर साउंड बॉक्स बजाने से जुड़े प्रतिबंध और उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई का प्रावधान है। सिंघवी ने कहा कि पहली बार पकड़े जाने पर मजिस्ट्रेट यानी कलेक्टर की अनुमति से वाहन छोड़ा जा सकता है। दूसरी बार उसी वाहन पर उल्लंघन मिलने पर परमिट निरस्त करने और हाईकोर्ट के आदेश के बाद ही उसे बहाल करने का प्रावधान बताया गया है। इसके लिए वाहनों का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी जरूरी है। उनका दावा है कि पिछले दस वर्षों में ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया, जिसमें इन आदेशों के अनुरूप जब्त वाहन को छोड़ने या दोबारा उल्लंघन पर कार्रवाई का रिकॉर्ड हो। उन्होंने मांग की है कि हाईकोर्ट के संबंधित आदेशों को प्रस्तावित विधेयक में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
निजी परिसरों में डीजे की अनुमति को लेकर सवाल
सिंघवी ने प्रस्तावित विधेयक में ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों के इस्तेमाल के लिए अनुमति से जुड़े प्रावधान पर भी आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक, प्रारूप में बिना अनुमति ऐसे यंत्रों के इस्तेमाल पर रोक सार्वजनिक स्थानों तक सीमित है। प्रस्तावित परिभाषा में सड़क और ऐसे स्थान शामिल हैं, जहां आम जनता पहुंचती है या भ्रमण करती है। सिंघवी का कहना है कि इस भाषा के कारण मैरिज गार्डन, निजी मकानों और दूसरे निजी परिसरों में डीजे बजाने के लिए अनुमति की अनिवार्यता समाप्त हो सकती है। उन्होंने इस प्रावधान को स्पष्ट करने की जरूरत बताई है।
निजी अस्पतालों और क्लिनिक को साइलेंस जोन में शामिल करने का सुझाव
मौन क्षेत्र यानी साइलेंस जोन में अस्पताल, नर्सिंग होम, शैक्षणिक संस्थान, छात्रावास, न्यायालय और केंद्र या राज्य सरकार के कार्यालय शामिल किए गए हैं। सिंघवी ने आपत्ति जताई है कि प्रस्तावित विधेयक में निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लिनिक का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने केंद्र के ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 का हवाला देते हुए इन सभी संस्थानों को विधेयक में स्पष्ट रूप से शामिल करने का सुझाव दिया है। उनके अनुसार, निजी अस्पतालों को लेकर किसी तरह की अस्पष्टता नहीं रहनी चाहिए।
साइलेंस जोन को 100 मीटर करने पर आपत्ति
प्रस्तावित विधेयक में मौन क्षेत्र की सीमा 100 मीटर निर्धारित की गई है। वहीं, वर्ष 1985 के राज्य अधिनियम के तहत शांत क्षेत्र से 200 मीटर के दायरे में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध का प्रावधान बताया गया है। सिंघवी ने इस दूरी को कम करने के बजाय बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने शक्तिशाली डीजे और ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों का हवाला देते हुए साइलेंस जोन की सीमा कम-से-कम 300 मीटर करने का सुझाव दिया है।
दिन में छह घंटे तक डीजे बजाने की छूट पर सवाल
प्रस्तावित विधेयक में रैली, सार्वजनिक कार्यक्रमों और उत्सवों के दौरान अनुमति लेकर दिन में अधिकतम छह घंटे तक ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों के इस्तेमाल का प्रावधान है। सिंघवी का कहना है कि केंद्र के वर्ष 2000 के नियमों में इस तरह की छह घंटे की छूट नहीं है। उन्होंने आशंका जताई कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए उन्होंने केंद्र के नियमों के अनुरूप प्रावधान रखने और ऐसी छूट नहीं देने का सुझाव दिया है।
रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रतिबंध रखने की मांग
प्रस्तावित विधेयक में कुछ निर्धारित परिस्थितियों में एक कैलेंडर वर्ष के दौरान अधिकतम 15 दिनों तक मध्यरात्रि तक ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों के इस्तेमाल की अनुमति देने का प्रावधान है। सिंघवी ने इस पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि प्रारूप में मध्यरात्रि की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। इससे देर रात तक डीजे बजाने की छूट का दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने विशेष छूट का प्रावधान हटाकर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रतिबंध लागू रखने की मांग की है।
स्कूलों के मैदानों और अन्य परिसरों का स्पष्ट उल्लेख हो
सिंघवी ने शैक्षणिक संस्थानों की परिभाषा को लेकर भी सुझाव दिया है। प्रस्तावित विधेयक में विद्यालय, मदरसा, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, व्यावसायिक अकादमी, प्रशिक्षण संस्थान और शिक्षा से जुड़े परिसरों को शामिल किया गया है। हालांकि, उनके मुताबिक, केंद्र के नियमों की भाषा के अनुरूप खेलकूद के मैदानों और अन्य परिसरों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने मांग की है कि इन स्थानों को भी विधेयक में साफ तौर पर शामिल किया जाए, ताकि नियमों को लागू करने में अस्पष्टता न रहे।
जब्त उपकरणों की नीलामी के बजाय नष्ट करने का सुझाव
प्रस्तावित विधेयक में जब्त किए गए ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों और अन्य उपकरणों की नीलामी का प्रावधान है। सिंघवी ने इसके संभावित दुरुपयोग की आशंका जताई है। उनका कहना है कि नीलामी के बाद यही उपकरण दोबारा डीजे संचालकों या दूसरे लोगों के पास पहुंच सकते हैं और उनका फिर इस्तेमाल हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम जब्ती सुनिश्चित होने के बाद ऐसे उपकरणों को नष्ट करने का प्रावधान बनाया जाए। साथ ही, जब्ती, अपील और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन भी सुनिश्चित किया जाए।
जुर्माना 15 लाख रुपये तक करने का सुझाव
सिंघवी ने प्रस्तावित जुर्माने की राशि को भी अपर्याप्त बताया है। उनके अनुसार, प्रारूप में पहली बार अपराध पर न्यूनतम 50 हजार रुपये और दूसरी बार अपराध पर न्यूनतम एक लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। उन्होंने केंद्र के ध्वनि प्रदूषण नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम 15 लाख रुपये की पेनल्टी का भी उल्लेख किया है। सिंघवी ने सुझाव दिया है कि पहली बार उल्लंघन पर पांच लाख से 15 लाख रुपये तक और दूसरी बार उल्लंघन पर 10 लाख से 15 लाख रुपये तक जुर्माना रखा जाए। उनका तर्क है कि दंड इतना प्रभावी होना चाहिए कि लोग नियमों का उल्लंघन करने से बचें।
बार-बार उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्रवाई की मांग
वर्ष 1985 के राज्य अधिनियम में पहली बार उल्लंघन पर अधिकतम छह महीने और दोबारा दोषसिद्धि पर एक साल तक के कारावास का प्रावधान बताया गया है। प्रस्तावित विधेयक में पहली दोषसिद्धि पर अधिकतम छह महीने और दोबारा दोषसिद्धि पर छह महीने से दो साल तक की सजा का प्रावधान है। इसमें बाद के अपराधों को गैर-जमानती बनाने की बात भी कही गई है। सिंघवी का दावा है कि राज्य गठन के बाद ध्वनि प्रदूषण से जुड़े उल्लंघनों में किसी आरोपी को सजा नहीं दिलाई जा सकी है। उन्होंने पहली बार उल्लंघन करने वालों के लिए भी गैर-जमानती अपराध का प्रावधान करने का सुझाव दिया है, ताकि कानून का प्रभावी पालन सुनिश्चित हो सके।



