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Bilaspur: शिक्षा विभाग ने नहीं पेश की RTE की सही जानकारी, हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, अब विस्तृत शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश

High Court expresses regarding RTE data: शिक्षा के अधिकार को लेकर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई में आधी-अधूरी जानकारी देना शिक्षा विभाग के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि प्रस्तुत शपथपत्र की सामग्री और उसके साथ लगाए गए दस्तावेज दोनों ही पूर्व आदेश के निर्देशों के अनुरूप नहीं […]

Bilaspur: शिक्षा विभाग ने नहीं पेश की RTE की सही जानकारी, हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, अब विस्तृत शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

High Court expresses regarding RTE data: शिक्षा के अधिकार को लेकर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई में आधी-अधूरी जानकारी देना शिक्षा विभाग के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि प्रस्तुत शपथपत्र की सामग्री और उसके साथ लगाए गए दस्तावेज दोनों ही पूर्व आदेश के निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। न्यायालय ने इस पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है।

हाईकोर्ट में हुई सुनवाई में न्यायालय ने कहा कि शिक्षा विभाग द्वारा यह भी नहीं बताया गया है कि SOP के Clause-5 का पालन किस प्रकार किया जा रहा है।

राज्य के शपथपत्र पर न्यायालय की टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं को सुना। राज्य की ओर से विद्वान उप महाधिवक्ता प्रसून भादुड़ी को तथा विभिन्न प्रतिवादियों की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ताओं एवं अधिवक्ताओं को भी सुना गया। इस मौके पर हस्तक्षेपकर्ता विकास तिवारी भी मौजूद रहे।

दरअसल 8 सितम्बर के न्यायालय के आदेश के अनुपालन में छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव द्वारा एक शपथपत्र प्रस्तुत किया गया था, लेकिन शपथपत्र का अवलोकन करने पर न्यायालय ने पाया कि यह संबंधित आदेश के अनुरूप नहीं है। उस आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि:

  1. RTE Act, 2009 की धारा 12(1)(c) के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत शपथपत्र प्रस्तुत किया जाए।
  2. उसमें RTE Act के क्रियान्वयन के लिए लागू SOP (Standard Operating Procedure) संलग्न की जाए।
  3. छत्तीसगढ़ के प्रत्येक स्कूल में RTE Act के अंतर्गत आरक्षित सीटों की संख्या बताई जाए।
  4. प्रत्येक स्कूल में उन सीटों की रिक्तियों (vacancies) की स्थिति बताई जाए।
  5. प्रत्येक स्कूल के लिए विस्तृत चार्ट दिया जाए, जिसमें:
    • RTE के अंतर्गत कुल आरक्षित सीटें,
    • प्रत्येक स्कूल में दाखिल किए गए विद्यार्थियों की संख्या,
    • तथा शेष रिक्त सीटों की संख्या शामिल हो।
  6. यह शपथपत्र सक्षम अधिकारी द्वारा निर्धारित समय के भीतर प्रस्तुत किया जाना था।

न्यायालय ने जताई कड़ी आपत्ति

न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि प्रस्तुत शपथपत्र की सामग्री और उसके साथ लगाए गए दस्तावेज—दोनों ही पूर्व आदेश के निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। न्यायालय ने इस पर गंभीर आपत्ति दर्ज की। साथ ही न्यायालय ने कहा कि यह भी नहीं बताया गया है कि SOP के Clause-5 का पालन किस प्रकार किया जा रहा है।

राज्य की ओर से दी गई ये दलील

इस मौके पर राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता ने शपथपत्र को सही ठहराते हुए RTE Rules के Rule-6 में वर्णित neighbourhood limits का तर्क दिया, लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Rule-6 में प्रत्येक स्कूल में RTE के अंतर्गत आरक्षित सीटों के प्रतिशत को बदलने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए न्यायालय ने राज्य के इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

पुराने आदेश का किया उल्लेख

इस दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने न्यायालय का ध्यान 14.09.2016 के आदेश की ओर दिलाया। उस आदेश में RTE Act को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए नई नीति बनाने के संबंध में सुझाव दिए गए थे। न्यायालय ने पुराने आदेश का वह महत्वपूर्ण हिस्सा फिर से उद्धृत किया।

25% RTE सीटें भरना जरुरी, मगर…

जिन स्कूलों पर RTE Act लागू होता है, उनमें 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) तथा वंचित समूह (Disadvantaged Groups) के विद्यार्थियों से भरी जानी चाहिए।

पुराने आदेश में यह भी पाया गया था कि निजी स्कूलों में 25% सीटें पूरी तरह नहीं भरी जा रही थीं, जबकि स्कूलों के शपथपत्रों के अनुसार नोडल अधिकारियों द्वारा अनुशंसित सभी विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया था। न्यायालय ने यह भी कहा था कि नोडल अधिकारियों द्वारा विद्यार्थियों के आवेदन स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए राज्य सरकार द्वारा स्पष्ट मानदंड निर्धारित नहीं किया गया था।

प्रवेश की प्रक्रिया के संबंध में पुराना निर्देश

न्यायालय ने सुझाव दिया था कि माता-पिता को सीधे उस स्कूल में आवेदन करने की अनुमति होनी चाहिए जहां वे अपने बच्चे को RTE के अंतर्गत प्रवेश दिलाना चाहते हैं। वहीं सरकार या नोडल अधिकारियों की भूमिका मुख्यतः यह सत्यापित करने तक सीमित होनी चाहिए कि विद्यार्थी वास्तव में EWS/वंचित वर्ग से संबंधित है या नहीं। इसके बाद स्कूलों को इन वर्गों के विद्यार्थियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना चाहिए।

दरअसल शिक्षा विभाग को आरटीई के आवेदनों को दो श्रेणियों में बांटने का सुझाव दिया गया था:

-3 किलोमीटर तक के क्षेत्र में रहने वाले विद्यार्थी।
-3 किलोमीटर से अधिक दूरी पर रहने वाले विद्यार्थी।

यदि संबंधित क्षेत्र से पर्याप्त आवेदन उपलब्ध नहीं हों तो आवेदन करने वाले सभी पात्र विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाए। यदि उपलब्ध सीटों से अधिक आवेदन हों तो लॉटरी/ड्रा ऑफ लॉट्स की व्यवस्था अपनाई जा सकती है।

यदि आवेदन सीटों से कम हों, तो 3 किलोमीटर से बाहर रहने वाले पात्र विद्यार्थियों को भी लाभ दिया जाना चाहिए।

न्यायालय ने राज्य सरकार को ऐसी योजना बनाने की अनुशंसा की थी जिससे EWS/Disadvantaged Groups के लिए निर्धारित सभी सीटें वास्तव में भरी जाएं और RTE Act को उसकी वास्तविक भावना के अनुरूप अक्षरशः लागू किया जाए।

राज्य सरकार को पहले भी दी गई चेतावनी

पुराने आदेश में तत्कालीन महाधिवक्ता ने आश्वासन दिया था कि यह adversarial litigation नहीं है और राज्य सरकार न्यायालय की अनुशंसाओं पर उचित दृष्टिकोण से विचार करेगी। तब न्यायालय ने कहा था कि यदि राज्य की ओर से उचित प्रतिक्रिया नहीं मिली तो वह कड़े आदेश पारित करने से पीछे नहीं हटेगा।

आरटीई को लेकर कछुआ चाल पर कोर्ट नराज

छत्तीसगढ़ सरकार RTE Act और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों को लागू करने में अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़ रही है। न्यायालय ने इस स्थिति पर असंतोष व्यक्त किया। इस दौरान राज्य की ओर से अधिक समय मांगा गया।

न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को एक और अवसर देते हुए निर्देश दिया कि वह 15 दिनों के भीतर विस्तृत शपथपत्र प्रस्तुत करे, जिसमें 15.06.2016, 14.09.2016 और 08.09.2026 के आदेशों का अनुपालनसे दर्शाया जाए।

केपीएस किड्स के मामले में भी हुई सुनवाई

इस मौके पर न्यायालय ने IA No.17 of 2026 पर सुनवाई की। इसमें इंटरवीनर विकास तिवारी ने कृष्णा पब्लिक एजुकेशन सोसाइटी द्वारा मान्यता नहीं मिलने के बाद भी कई स्थानों केपीएस किड्स के नाम पर नर्सरी कक्षाओं का संचालन किये जाने का मामला भी लगाया है। Intervenor द्वारा न्यायालय के विचार हेतु कुछ दस्तावेज रिकॉर्ड में शामिल करने (incorporating certain documents) के लिए प्रस्तुत किया गया था। इस मौके पर केपीएस की ओर से उपस्थित अधिवक्ता सुनील ओटवानी ने मामले में आपत्ति (objection) दाखिल करने के लिए थोड़ा समय मांगा। न्यायालय ने अनुमति देते हुए निर्देश दिया है कि
केपीएस को 15 दिनों के भीतर अपनी आपत्ति दाखिल करनी होगी और उसकी प्रति Intervenor विकास तिवारी के अधिवक्ता को देनी होगी।

दरअसल पूर्व में हाई कोर्ट ने केपीएस प्रबंधन को बिना मान्यता के किड्स कक्षाएं अलग से संचालित करने के संबंध में अपना पक्ष रखने के लिए 3 बार आदेश दिया जा चुका है, मगर जवाब देने की बजाय प्रबंधन द्वारा उलटे नए सत्र 2026-27 में फिर से नर्सरी में बच्चों को प्रवेश दिया जा रहा है। इंटरवीनर विकास तिवारी ने इस पर आपत्ति जताते हुए स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रवेश के लिए अख़बारों में दिए गए विज्ञापन की प्रति प्रस्तुत की थी। ऐसे में कोर्ट ने केपीएस प्रबंधन को रेस्पोंडेंट नंबर 51 बनाया है। अब कोर्ट ने प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के लिए एक और मौका दिया है।

सीजी में RTE वर्तमान स्थिति: सीटें घटकर हुईं 26 हजार

शिक्षा के अधिकार कानून को लेकर प्रदेश में शिक्षा विभाग ने जिस तरह नियमों में बदलाव किया है, उससे स्थिति और भी ख़राब होती जा रही है। पूर्व में जब कक्षा पहली के अलावा नर्सरी की कक्षाओं में भी RTE के तहत प्रवेश मिला करते थे, तब लगभग 85 हजार बच्चों को प्रवेश मिला करता था, मगर वर्तमान में सीटें घटकर मात्र 26 हजार रह गई हैं। इसका नुकसान RTE के पात्र बच्चों को हो रहा है। इधर शिक्षा विभाग ने हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक RTE को लेकर कोई नई गाइडलाईन तैयार नहीं की है। इधर कोर्ट में यह मामला लंबा खींचता जा रहा है। बहरहाल देखना है कि शिक्षा विभाग इस बार भी RTE और स्कूलों की मान्यता को लेकर कोई अंतिम निर्णय लेता है या फिर इसी तरह तारीख पर तारीख मिलती रहेगी।

AQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. हाईकोर्ट ने नाराजगी क्यों जताई?
Ans. शिक्षा विभाग द्वारा RTE से संबंधित आधी-अधूरी जानकारी पेश करने और 8 सितंबर के आदेश के अनुरूप शपथपत्र नहीं होने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है।

Q2. SOP के Clause-5 से क्या मतलब है?
Ans. RTE के तहत एडमिशन प्रक्रिया के लिए बनाई गई Standard Operating Procedure के Clause-5 के पालन की जानकारी विभाग ने नहीं दी, जिस पर कोर्ट ने सवाल उठाया।

Q3. अब हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिया है?
Ans. हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को विस्तृत और सही जानकारी के साथ नया शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

Shami Imam
लेखक / पत्रकार:

Shami Imam

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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