Nidal Malik Hasan Execution: अमेरिका में फोर्ट हुड गोलीबारी कांड के दोषी निदाल मलिक हसन को गोली मारकर मौत की सजा देने का ऐलान किया गया है। इतना ही नहीं इस घटना का लाइव प्रसारण भी किया जाएगा। ऐसे में भारत में चर्चा हो रही है कि क्या किसी दोषी को गोली मारकर मौत की सजा दी जा सकती है? क्या भारत सरकार फांसी या किसी अन्य तरीके से दी जाने वाली मौत की सजा का सीधा प्रसारण कर सकती है? भारतीय कानून में इन दोनों सवालों के जवाब अलग-अलग हैं।
भारत में सामान्य आपराधिक मामलों में मौत की सजा देने का तरीका फांसी है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 393(5) के अनुसार, मौत की सजा सुनाते समय अदालत को आदेश देना होता है कि दोषी को गर्दन से तब तक लटकाया जाए, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। हालांकि, सैन्य कानून में अलग प्रावधान मौजूद हैं।
सेना के जवान को गोली मारकर दी जा सकती है मौत की सजा
भारतीय सेना अधिनियम, 1950 की धारा 166 के तहत सैन्य अदालत यानी कोर्ट मार्शल को मौत की सजा के मामले में दो तरीकों में से एक चुनने का अधिकार है। इसके तहत दोषी को फांसी दी जा सकती है या गोली मारकर मौत की सजा दी जा सकती है। यह प्रावधान सैन्य कानून के तहत आने वाले मामलों के लिए है, आम नागरिकों के सामान्य आपराधिक मुकदमों के लिए नहीं। इसका मतलब है कि भारत में गोली मारकर मौत की सजा देने का प्रावधान पूरी तरह गैरकानूनी नहीं है। लेकिन इसका इस्तेमाल संबंधित सैन्य कानून और कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है।
क्या भारत में मौत की सजा का लाइव प्रसारण हो सकता है?
भारत में मौत की सजा का सीधा प्रसारण करने की कोई सामान्य कानूनी व्यवस्था नहीं है। आम आपराधिक मामलों में दोषी को जेल के भीतर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार फांसी दी जाती है। जेल नियमों में सजा के दौरान मौजूद रहने वाले अधिकारियों और अन्य अधिकृत व्यक्तियों का उल्लेख है। इसे आम जनता के सामने आयोजित कार्यक्रम की तरह नहीं किया जाता।
क्या भविष्य में भारत में ऐसा कानून बनाया जा सकता है?
सैद्धांतिक रूप से संसद कानूनों में बदलाव कर सकती है, लेकिन ऐसा बदलाव संविधान और मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा जाएगा। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों में भी कानूनी प्रक्रिया और मानवीय गरिमा के महत्व पर जोर दिया है।



