Supreme Court: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा छात्र को 5 लाख रुपये का कारण बताओ नोटिस जारी करने पर कड़ी नाराजगी जताई है।
शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में ही छात्रों के खिलाफ सभी FIR रद्द करने और भविष्य में किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक का आदेश दिया था, तो मजिस्ट्रेट ने उस आदेश का उल्लंघन करने का साहस कैसे किया।
‘मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई?’ – CJI की तीखी टिप्पणी
वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने इस मामले को मौखिक उल्लेख (Oral Mentioning) के जरिए सीजेआई सूर्यकांत की पीठ के समक्ष उठाया। मामले की सुनवाई के दौरान CJI ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत के फैसले के खिलाफ जाकर नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है? हमने स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई जबरन या सख्त कार्रवाई नहीं होगी। देश का कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज नहीं कर सकता।”
नोटिस वापस लेने के बावजूद अवमानना का उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूछा कि जब प्रशासन ने नोटिस वापस ले लिया है, तो क्या इस मामले में आगे कोई कार्रवाई बाकी रह जाती है? इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि केवल नोटिस वापस लेने से अदालत के आदेश की अवमानना खत्म नहीं हो जाती। यह शीर्ष अदालत की गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सीधा अपमान है। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश के कुछ अधिकारी छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी पर क्या थे आरोप?
पूरा मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के सेकंड ईयर के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट तृतीय की कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126/135 के तहत अक्षत के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। 4 सितंबर 2026 को जारी पुलिस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि छात्र ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में अन्य छात्रों को शामिल होने के लिए उकसा रहा था और सरकार विरोधी बातें फैला रहा था, जिससे शांति और कानून व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा था।
5 लाख रुपये के पर्सनल बॉन्ड की मांग और प्रशासनिक बैकफुट
पुलिस की रिपोर्ट को आधार बनाकर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अक्षत त्रिपाठी को 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड न भरने पर जवाब देने के लिए कारण बताओ नोटिस थमा दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख और पुराने आदेशों की अवहेलना उजागर होने के डर से इस नोटिस को अमल में लाए जाने से पहले ही वापस ले लिया गया। बहरहाल, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली और अदालती आदेशों के उल्लंघन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
(FAQs)
प्र 1: CJI सूर्यकांत किस बात को लेकर ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट पर भड़क गए?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्रों पर किसी भी सख्त कार्रवाई पर रोक के बावजूद गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र को 5 लाख रुपये का नोटिस जारी करने पर CJI ने मजिस्ट्रेट को फटकार लगाई।
प्र 2: छात्र अक्षत त्रिपाठी पर पुलिस ने क्या आरोप लगाए थे?
उत्तर: पुलिस ने आरोप लगाया था कि वह यूनिवर्सिटी में छात्रों को उकसा रहा था और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए भड़का रहा था।
प्र 3: यह नोटिस किस कानून और धारा के तहत जारी किया गया था?
उत्तर: यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126/135 के तहत जारी किया गया था।
प्र 4: कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने क्या तर्क दिया?
उत्तर: उन्होंने कहा कि केवल नोटिस वापस ले लेने से अदालत की अवमानना का अपराध खत्म नहीं होता, यह देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश और गरिमा का उल्लंघन है।
प्र 5: क्या छात्र के खिलाफ जारी किया गया 5 लाख का नोटिस अभी भी प्रभावी है?
उत्तर: नहीं, विवाद बढ़ने और मामला उजागर होने के बाद प्रशासन ने इस नोटिस को अमल में लाए जाने से पहले ही वापस ले लिया था।



