FAO report 2026 land degradation: दुनिया में करीब 1.56 अरब हेक्टेयर जमीन खराब हो चुकी है। यह पूरी दुनिया की जमीन का करीब 10 फीसदी हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, खराब जमीन का यह क्षेत्र भारत के कुल क्षेत्रफल से करीब 5.2 गुना बड़ा है। इसका असर सिर्फ मिट्टी तक सीमित नहीं है। खेती, भोजन, पानी, जंगल, पशुपालन और ग्रामीण रोजगार भी इससे जुड़े हैं।
भारत में भी बड़ी मात्रा में जमीन खेती के लिहाज से उपयोगी नहीं है। 2023-24 के सरकारी भूमि उपयोग आंकड़ों के मुताबिक, करीब 1.66 करोड़ हेक्टेयर जमीन बंजर और खेती के लिए अनुपयुक्त थी। वहीं करीब 1.16 करोड़ हेक्टेयर जमीन ऐसी थी, जिसे सुधारकर खेती के लायक बनाया जा सकता है। दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर करीब 2.82 करोड़ हेक्टेयर जमीन ऐसी बनती है, जहां सुधार और बेहतर इस्तेमाल की संभावना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी 2.82 करोड़ हेक्टेयर जमीन को सीधे खेती में बदला जा सकता है। जमीन की मिट्टी, पानी, मौसम और स्थानीय जरूरत के हिसाब से उसका इस्तेमाल तय करना होगा।
दुनिया में जमीन और जंगलों की हालत कितनी खराब?
FAO के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में 1.56 अरब हेक्टेयर जमीन खराब हो चुकी है। इसके अलावा 46 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा जंगल भी खराब स्थिति में हैं। 2025 में दुनिया का कुल वन क्षेत्र करीब 4.14 अरब हेक्टेयर था। यह दुनिया की कुल जमीन का करीब 32 फीसदी है। 1990 से 2025 के बीच करीब 48.9 करोड़ हेक्टेयर जंगल खत्म हुए। इसी अवधि में प्राकृतिक रूप से बढ़ने वाले जंगलों का क्षेत्रफल 32.4 करोड़ हेक्टेयर घटा। इससे साफ है कि जमीन और जंगलों की स्थिति का सवाल सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध भोजन और इंसानी जीवन से भी है।
एशिया में सबसे ज्यादा जमीन प्रभावित
क्षेत्रवार आंकड़ों में एशिया की स्थिति भी अहम है। यहां करीब 58.3 करोड़ हेक्टेयर जमीन खराब स्थिति में है। यह एशिया की कुल जमीन का लगभग 19 फीसदी है। अफ्रीका में करीब 33.4 करोड़ हेक्टेयर यानी 12 फीसदी जमीन प्रभावित है। दक्षिण अमेरिका में करीब 24.5 करोड़ हेक्टेयर यानी 14 फीसदी जमीन खराब स्थिति में बताई गई है। जमीन खराब होने की वजह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती है। इसका असर भी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से बदलता है। लेकिन खेती, पानी और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कई जगह दिखाई देता है।
जमीन पर बढ़ता जा रहा दबाव
बढ़ती आबादी के साथ खेती और रहने के लिए जमीन की मांग बढ़ी है। शहरों का विस्तार, सड़क और दूसरी निर्माण परियोजनाएं, जंगलों की कटाई और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव भी इस दबाव को बढ़ाते हैं। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन से सूखा, बढ़ती गर्मी और दूसरी प्राकृतिक परिस्थितियां भी जमीन की स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं। यानी जमीन खराब होने के पीछे केवल एक कारण नहीं है। इंसानी गतिविधियों और बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों का दबाव एक साथ काम करता है।
2030 तक बहाली की जरूरत, लेकिन बड़ा अंतर बाकी
खराब जमीन और जंगलों को दोबारा ठीक करने की कोशिश भी चल रही है। आंकड़ों के मुताबिक, 2030 तक 46.9 करोड़ हेक्टेयर खराब पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावी तरीके से बहाल करने की जरूरत है। 2026 तक करीब 20.65 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र ही बहाली के तहत दर्ज हुआ था। ऐसे में करीब 26.25 करोड़ हेक्टेयर का अंतर अभी बाकी है। जंगलों के खत्म होने की रफ्तार में भी अलग-अलग अवधि में बदलाव आया है। 1990-2000 के दौरान हर साल औसतन करीब 1.07 करोड़ हेक्टेयर जंगल कम हुए। 2000-2015 के दौरान यह रफ्तार घटकर करीब 36.8 लाख हेक्टेयर सालाना हुई। 2015-2025 में यह फिर बढ़कर करीब 41.2 लाख हेक्टेयर सालाना हो गई।
भारत में कितनी जमीन खेती के काम नहीं आती?
2023-24 के सरकारी भूमि उपयोग आंकड़ों के मुताबिक भारत में
- करीब 1.66 करोड़ हेक्टेयर जमीन बंजर और खेती के लिए अनुपयुक्त थी।
- करीब 1.16 करोड़ हेक्टेयर जमीन को सुधारकर खेती योग्य बनाया जा सकता है।
- करीब 1.12 करोड़ हेक्टेयर जमीन लंबे समय से खाली थी।
- करीब 1.49 करोड़ हेक्टेयर जमीन उस समय खेती से खाली थी।
- करीब 13.90 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई।
- खेती योग्य जमीन की कुल श्रेणी करीब 17.96 करोड़ हेक्टेयर थी।
यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। बंजर जमीन, लंबे समय से खाली जमीन और उस समय खेती में इस्तेमाल नहीं हो रही जमीन एक ही श्रेणी नहीं हैं। किसी जमीन का एक साल खेती में इस्तेमाल न होना यह साबित नहीं करता कि वह हमेशा के लिए बेकार है।
2.82 करोड़ हेक्टेयर का आंकड़ा क्यों अहम?
भारत में 1.66 करोड़ हेक्टेयर बंजर और खेती के लिए अनुपयुक्त जमीन है। इसके अलावा 1.16 करोड़ हेक्टेयर जमीन ऐसी है, जिसे सुधारकर खेती योग्य बनाया जा सकता है। इन्हें जोड़ने पर 2.82 करोड़ हेक्टेयर का आंकड़ा सामने आता है। लेकिन इस पूरे क्षेत्र को खेती में बदलना जरूरी नहीं है। कुछ जगहों पर जमीन की प्राकृतिक स्थिति ऐसी हो सकती है कि वहां खेती की बजाय जंगल, घास का मैदान, जल संरक्षण या पशुपालन ज्यादा उपयोगी हो। यही वजह है कि ‘सुधार योग्य जमीन’ को सीधे ‘खेती योग्य जमीन’ मानना सही नहीं होगा।
जमीन सुधारने का मतलब सिर्फ खेती बढ़ाना नहीं
जमीन सुधारने का मतलब हर खाली जगह पर खेती शुरू करना नहीं है। कहीं मिट्टी का कटाव रोकना जरूरी हो सकता है। कहीं पानी को जमीन के अंदर पहुंचाना ज्यादा अहम हो सकता है। कुछ इलाकों में पेड़-पौधों को दोबारा उगाना या चराई को नियंत्रित करना बेहतर विकल्प हो सकता है। अगर किसी क्षेत्र की मिट्टी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है, तो वहां जंगल या प्राकृतिक घास को वापस लाना भी जमीन के बेहतर इस्तेमाल का तरीका हो सकता है। यानी जमीन की सेहत सुधारने का लक्ष्य सिर्फ खेती का रकबा बढ़ाना नहीं है। सही इस्तेमाल का फैसला जमीन की स्थानीय स्थिति और जरूरत के आधार पर करना होगा।
(FAQs)
Q1. संयुक्त राष्ट्र (FAO) की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कितनी जमीन खराब हो चुकी है?
उत्तर: FAO की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में करीब 1.56 अरब हेक्टेयर जमीन खराब हो चुकी है, जो पूरी दुनिया की कुल जमीन का लगभग 10 फीसदी है।
Q2. एशिया में जमीन खराब होने का क्या आंकड़ा है?
उत्तर: क्षेत्र के हिसाब से एशिया में करीब 58.3 करोड़ हेक्टेयर जमीन खराब स्थिति में है, जो एशिया की कुल जमीन का लगभग 19 फीसदी हिस्सा है।
Q3. 1990 से 2025 के बीच दुनिया में कितने जंगल खत्म हुए हैं?
उत्तर: आंकड़ों के अनुसार 1990 से 2025 के बीच दुनिया भर में करीब 48.9 करोड़ हेक्टेयर जंगल खत्म हो चुके हैं।
Q4. भारत में कितनी जमीन बंजर और खेती के लिए अनुपयुक्त मानी गई है?
उत्तर: सरकारी भूमि उपयोग आंकड़ों (2023-24) के अनुसार, भारत में करीब 1.66 करोड़ हेक्टेयर जमीन बंजर और खेती के लिए अनुपयुक्त है, जबकि 1.16 करोड़ हेक्टेयर जमीन सुधार के योग्य है।
Q5. भारत में कुल कितने क्षेत्रफल में वास्तविक खेती हुई?
उत्तर: वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 17.96 करोड़ हेक्टेयर खेती योग्य जमीन में से लगभग 13.90 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर वास्तविक रूप से खेती हुई थी।



