रविवार, 20 सितंबर 2026 रवि, 20 सित॰ |
संस्करण:
ब्रेकिंग न्यूज़
राष्ट्रीय

FDA Action: 11 रुपये का IV सेट 325 में, अस्पताल के बिल में कितना बढ़ रहा मरीज का खर्च?

मरीज अस्पताल में भर्ती होता है तो उसकी नजर आमतौर पर कमरे, डॉक्टर की फीस, जांच और दवाइयों के बड़े खर्च पर जाती है। लेकिन बिल में कई छोटी-छोटी मेडिकल सामग्री भी जुड़ती रहती हैं। आईवी सेट, सिरिंज, कैनुला, कैथेटर, ग्लव्स, ड्रेसिंग सामग्री और दूसरी कंस्यूमेबल्स। महाराष्ट्र FDA के हालिया सर्वे ने इन्हीं छोटी दिखने […]

Tukaram Munde FDA Action
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

मरीज अस्पताल में भर्ती होता है तो उसकी नजर आमतौर पर कमरे, डॉक्टर की फीस, जांच और दवाइयों के बड़े खर्च पर जाती है। लेकिन बिल में कई छोटी-छोटी मेडिकल सामग्री भी जुड़ती रहती हैं। आईवी सेट, सिरिंज, कैनुला, कैथेटर, ग्लव्स, ड्रेसिंग सामग्री और दूसरी कंस्यूमेबल्स। महाराष्ट्र FDA के हालिया सर्वे ने इन्हीं छोटी दिखने वाली चीजों की कीमत को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है।

FDA के मुताबिक, 11.05 रुपये के ट्रेड प्राइस वाला एक IV सेट 325 रुपये की MRP के साथ मिला। यानी दोनों कीमतों में 313.95 रुपये का अंतर था। लागत के मुकाबले यह करीब 2,841 फीसदी का मार्कअप है। यह आंकड़ा महाराष्ट्र का है। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल जरूर उठता है। छत्तीसगढ़ के निजी अस्पतालों में जिन मेडिकल कंस्यूमेबल्स का इस्तेमाल रोज होता है, उनकी खरीद कीमत और मरीज के बिल में दर्ज कीमत के बीच कितना अंतर है?

एक IV सेट में 313 रुपये से ज्यादा का अंतर

महाराष्ट्र FDA के अनुसार, जिस IV सेट का ट्रेड प्राइस 11.05 रुपये था, उसकी MRP 325 रुपये थी। खरीद कीमत और MRP के बीच 313.95 रुपये का अंतर निकलता है। FDA ने इसे करीब 2,841 फीसदी मार्कअप के रूप में बताया है। इसे मुनाफा कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। क्योंकि किसी अस्पताल की वास्तविक कमाई निकालने के लिए उसके सभी खर्चों और खरीद शर्तों को देखना पड़ेगा। लेकिन मरीज के नजरिए से सवाल सीधा है,जिस सामान की खरीद कीमत इतनी कम है, वह बिल में कितनी रकम पर दर्ज हो रहा है?

मेडिकल सामग्रीखरीद/ट्रेड कीमतMRPअंतरलागत पर मार्कअप
IV सेट₹11.05₹325₹313.95करीब 2,841%
सिरिंज₹6.75₹57.20₹50.45करीब 747%
कैथेटर₹29.41₹310₹280.59करीब 954%

सिरिंज और कैथेटर में भी बड़ा अंतर

FDA के सामने रखे गए आंकड़ों में सिरिंज और कैथेटर भी शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 6.75 रुपये की खरीद कीमत वाली सिरिंज की MRP 57.20 रुपये थी। यानी कीमत में 50.45 रुपये का अंतर था। लागत के आधार पर यह करीब 747 फीसदी का मार्कअप बैठता है। इसी तरह 29.41 रुपये की खरीद कीमत वाले कैथेटर की MRP 310 रुपये बताई गई। दोनों के बीच 280.59 रुपये का अंतर था। लागत के मुकाबले यह करीब 954 फीसदी का मार्कअप है। यहां भी खरीद कीमत से MRP का अंतर अस्पताल के शुद्ध मुनाफे के बराबर नहीं है। यही फर्क स्टोरी में साफ रखना जरूरी है।

अब सवाल छत्तीसगढ़ का

रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई और रायगढ़ जैसे शहरों में निजी अस्पतालों में रोज बड़ी संख्या में मरीज इलाज कराते हैं। गंभीर बीमारी या ऑपरेशन के दौरान एक मरीज के इस्तेमाल में कई तरह की कंस्यूमेबल्स आ सकती हैं। एक मरीज को लगने वाला IV सेट, कई सिरिंज, कैनुला, कैथेटर, ग्लव्स और ड्रेसिंग सामग्री अलग-अलग मद में बिल का हिस्सा बन सकती हैं। अगर हर वस्तु की कीमत में खरीद और बिलिंग के बीच बड़ा अंतर हो, तो छोटी रकम मिलकर कुल बिल में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है।

अस्पताल की खरीद कीमत और मरीज का बिल, दोनों अलग चीजें

अस्पताल सीधे निर्माता से खरीद सकता है या डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए। खरीद की मात्रा, भुगतान की शर्त, ब्रांड और सप्लाई व्यवस्था के कारण खरीद कीमत अलग हो सकती है।दूसरी तरफ, मरीज के बिल में किसी वस्तु की कीमत के साथ अस्पताल के दूसरे खर्च भी जुड़े हो सकते हैं। इसलिए खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई रकम के बीच पूरा अंतर ही अस्पताल का शुद्ध लाभ नहीं माना जा सकता। एसोसिएशन ऑफ़ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ़ इंडिया ने भी हालिया विवाद पर यही बात उठाई है। संगठन के मुताबिक, अस्पताल MRP तय नहीं करते और कीमतों के अंतर को सीधे अस्पतालों की मिलीभगत या मुनाफे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

फिर 2,841 फीसदी का सवाल क्यों अहम है?

क्योंकि मरीज के पास इलाज के दौरान कीमत की तुलना करने का विकल्प बहुत सीमित होता है। अस्पताल में भर्ती मरीज को तत्काल इलाज चाहिए। वह यह तय करने की स्थिति में नहीं होता कि IV सेट किस कंपनी का लिया जाए या कैथेटर किसी दूसरे सप्लायर से सस्ता मिलेगा या नहीं। यही कारण है कि महाराष्ट्र FDA ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली प्राथमिक चिकित्सा सामग्री और कंस्यूमेबल्स की कीमतों पर नियमन की जरूरत उठाई है। FDA ने NPPA के सामने इन सामग्रियों को DPCO के तहत लाने और कीमतों पर हस्तक्षेप की मांग की है। केंद्र सरकार ने भी NPPA से इस मामले में रिपोर्ट मांगी है।

छत्तीसगढ़ में एक सरकारी उदाहरण भी सामने आया

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2023 में चिकित्सा उपकरण और जांच में इस्तेमाल होने वाले रसायन खरीदने में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) ने 22 जनवरी 2026 को छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (सीजीएमएससीएल), स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और चार कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। एफआईआर के अनुसार, हमर लैब के लिए उपकरण और जांच सामग्री खरीदने से पहले उनकी जरूरत का सही आकलन नहीं किया गया था। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में उपकरण रखने के लिए जगह, बिजली और ठंडे भंडारण की सुविधा है या नहीं, इसकी भी ठीक से जांच नहीं की गई थी। एफआईआर में करीब 411 करोड़ रुपए की खरीद का जिक्र था। जांच में खून का नमूना लेने के लिए इस्तेमाल होने वाली ईडीटीए ट्यूब की कीमत में भी बड़ा अंतर सामने आया था। आरोप था कि मोक्षित कॉरपोरेशन से एक ट्यूब 2,352 रुपए में खरीदी गई थी, जबकि दूसरी जगहों पर यही ट्यूब अधिकतम 8.50 रुपए में खरीदी गई थी। मामले में रायपुर, दुर्ग और हरियाणा में एक दर्जन से ज्यादा जगहों पर छापेमारी भी की गई थी। इस दौरान दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक सामान और बैंक खातों से जुड़े कागजात बरामद किए गए थे। एफआईआर में यह भी आरोप लगाया गया था कि मोक्षित कॉरपोरेशन के पास अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बनाने की अपनी फैक्ट्री नहीं थी, फिर भी उसे ठेका दिया गया था। आरोप था कि टेंडर में शामिल दूसरी कंपनियों ने भी उसके साथ मिलकर हिस्सा लिया था। जांच एजेंसी ने 750 करोड़ रुपए से ज्यादा की खरीद में भी कथित गड़बड़ी और सरकारी पैसे को नुकसान पहुंचाने के आरोप दर्ज किए थे।

छत्तीसगढ़ के मरीज पर संभावित असर

अगर राज्य में किसी मेडिकल कंस्यूमेबल की खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई रकम के बीच बड़ा अंतर पाया जाता है, तो इसका असर सीधे मरीज के कुल बिल पर पड़ सकता है। खासकर लंबे समय तक भर्ती रहने वाले मरीजों में ऐसी कई छोटी मदें जुड़ सकती हैं। एक-एक वस्तु की रकम छोटी दिख सकती है, लेकिन कई वस्तुओं और कई दिनों के इलाज के बाद कुल अंतर बढ़ सकता है।

5 FAQs


Q1. एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने अस्पतालों के खिलाफ क्या कार्रवाई का प्लान बनाया है?

उत्तर: एफडीए ने अस्पतालों में मेडिकल सामग्री की ओवरप्राइसिंग रोकने के लिए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण को नीति प्रस्ताव भेजकर प्राथमिक चिकित्सा सामग्री को मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के तहत लाने की मांग की है।

Q2. अस्पतालों में किन मेडिकल सामग्रियों पर अत्यधिक मुनाफाखोरी पाई गई?

उत्तर: जांच में 11 रुपये का आईवी सेट 325 रुपये में, और 40-50 रुपये का नेबुलाइजर/ऑक्सीजन मास्क 650 से 715 रुपये में बेचे जाने का खुलासा हुआ है। इसके अलावा कैथेटर और कैनुला के दामों में भी भारी अंतर मिला।

Q3. पिछले तीन महीनों में महाराष्ट्र एफडीए ने क्या कार्रवाई की है?

उत्तर: एफडीए ने दवा कंपनियों के 2,485 निरीक्षण कर 230 लाइसेंस निलंबित किए। इसके अलावा मेडिकल स्टोर के 11,780 निरीक्षण कर 2,075 लाइसेंस निलंबित और 394 लाइसेंस रद्द किए।

Q4. आईएएस तुकाराम मुंढे कौन हैं?

उत्तर: तुकाराम मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर के आईएएस अधिकारी हैं, जो वर्तमान में महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त हैं और अपनी सख्त कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं।

Q5. एफडीए ने एनपीपीए से क्या मांग की है?

उत्तर: एफडीए ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली प्राथमिक चिकित्सा सामग्री और उपभोग वस्तुओं (कंस्यूमेबल्स) को औषधि मूल्य नियंत्रण व्यवस्था (DPCO) के दायरे में लाने की मांग की है।

Deeksha Mishra
लेखक / पत्रकार:

Deeksha Mishra

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

विज्ञापन