शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2026 शुक्र, 30 अक्तू॰ |
संस्करण:
ब्रेकिंग न्यूज़
धर्म अध्यात्म

Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026 को रखा जाएगा, जानिए अहोई माता की पूजा का शुभ मुहूर्त-तारों और चंद्रमा को अर्घ्य देने का समय

Ahoi Ashtami
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य
खास बातें (Key Highlights)
  • Ahoi Ashtami 2026: संतान की लंबी उम्र, उनके उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इस वर्ष 1 नवंबर 2026 को रखा जाएगा।
  • कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाले इस पावन अवसर पर माताएं दिनभर उपवास रखकर अहोई माता की आराधना करती हैं।
  • शाम को माता की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद तारों को अर्घ्य देकर संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
  • वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर को दोपहर 02:51 बजे हो रहा है।

Ahoi Ashtami 2026: संतान की लंबी उम्र, उनके उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इस वर्ष 1 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाले इस पावन अवसर पर माताएं दिनभर उपवास रखकर अहोई माता की आराधना करती हैं। शाम को माता की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद तारों को अर्घ्य देकर संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर को दोपहर 02:51 बजे हो रहा है। यह तिथि अगले दिन यानी 2 नवंबर को दोपहर 01:10 बजे समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदयातिथि की मान्यता सर्वोपरि होने के कारण अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को ही रखा जाएगा। इसी दिन सभी माताएं अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए यह नियमबद्ध व्रत पूरा करेंगी।

पूजा के लिए मिलेगा 1 घंटा 18 मिनट का शुभ मुहूर्त

अहोई माता की पूजा के लिए इस वर्ष बेहद शुभ संयोग बन रहा है। 1 नवंबर को अहोई माता की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05:36 बजे से शुरू होकर शाम 06:54 बजे तक रहेगा। यानी माताओं को पूजा-अर्चना और कथा सुनने के लिए कुल 1 घंटा 18 मिनट की समयावधि मिलेगी। शास्त्रों के अनुसार, तय मुहूर्त में की गई पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है।

तारों को अर्घ्य देने और चंद्र दर्शन का समय

अहोई अष्टमी के व्रत में संध्या समय तारों के दर्शन और अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। शाम को लगभग 06:00 बजे तारे स्पष्ट दिखाई देने की संभावना है, जिसके बाद महिलाएं जल से तारों को अर्घ्य देकर अपनी संतान की दीर्घायु का आशीर्वाद मांगेंगी। वहीं जो महिलाएं चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का पारण करती हैं, उनके लिए चंद्रोदय का समय रात 11:40 बजे रहेगा।

सुबह संकल्प के साथ शुरू होगी व्रत की विधि

अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान के बाद माताओं को हाथ में जल लेकर अपनी संतान की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प लेने के उपरांत पूरे दिन संयम और नियम के साथ व्रत का पालन किया जाता है। घर के मंदिर में शुद्ध वातावरण बनाकर शाम की पूजा की तैयारियां की जाती हैं।

शाम को इस तरह करें अहोई माता की स्थापना और पूजन

शाम के समय पूजा स्थल पर अहोई माता का चित्र स्थापित किया जाता है। कई परिवारों में परंपरा अनुसार गेरू और हल्दी से दीवार पर भी माता की आकृति बनाई जाती है। पूजा के दौरान अहोई माता को रोली, अक्षत, ताजे फूल और विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद दीपक जलाकर अहोई माता की आरती और कथा का श्रवण किया जाता है।

मां दुर्गा का ही स्वरूप हैं अहोई माता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अहोई माता को भगवती मां दुर्गा का ही एक रूप माना गया है। यह व्रत मुख्य रूप से मातृशक्ति के अपनी संतान के प्रति अगाध स्नेह और समर्पण का प्रतीक है। मान्यता है कि सच्चे मन से अहोई माता की पूजा करने पर बच्चों पर आने वाले सभी संकट, रोग और बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा उनका भविष्य उज्ज्वल होता है।

जानिए अहोई अष्टमी से जुड़ी सेहू के बच्चे की पौराणिक कथा

अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा एक साहूकार के परिवार से जुड़ी है, जिसमें साहूकार की बेटी से अनजाने में मिट्टी खोदते समय सेहू के एक बच्चे की मौत हो गई थी। सेहू के दुखी होकर दिए गए श्राप को ननद की रक्षा के लिए छोटी बहू ने अपने ऊपर ले लिया। बाद में पंडित के परामर्श पर छोटी बहू ने पूरी श्रद्धा से गौ माता की निस्वार्थ सेवा की। उसकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर गौ माता की सहायता से सेहू ने अपना श्राप वापस ले लिया और परिवार में पुनः खुशहाली लौट आई।

Shravan Sharma
लेखक / पत्रकार:

Shravan Sharma

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

विज्ञापन