Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करने और उनके तर्पण की परंपरा घर-घर में निभाई जाती है। लेकिन मोक्ष की नगरी गयाजी में एक ऐसी अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा भी जीवंत है, जो फिल्मों में ही नहीं बल्कि हकीकत में भी हैरान करती है।
गयाजी के भस्मकूट पर्वत स्थित जनार्दन स्वामी मंदिर में विशेष परिस्थितियों में जीवित व्यक्ति स्वयं अपना ‘आत्म पिंडदान’ कराते हैं।
जनार्दन स्वामी मंदिर: दुनिया का एकमात्र अनोखा पिंडवेदी स्थल
गयाजी में वर्तमान में लगभग 45 प्रमुख पिंडवेदियां हैं, जिनमें जनार्दन स्वामी मंदिर ही वह एकमात्र स्थल माना जाता है जहां पूर्वजों के बजाय जीवित व्यक्ति का पिंडदान कराया जाता है। मां मंगला गौरी मंदिर के समीप स्थित इस प्राचीन मंदिर में भगवान विष्णु बाल स्वरूप में विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था।
आत्म पिंडदान का धार्मिक महत्व और नियम
मंदिर के पुजारियों के अनुसार, आत्म पिंडदान का अनुष्ठान सामान्य पितृ पिंडदान से बिल्कुल अलग होता है। इसके तहत विशेष रूप से वे लोग आते हैं जिन्होंने संन्यास ले लिया हो, जिनके माता-पिता का निधन हो चुका हो या जिन्होंने वैराग्य का मार्ग अपना लिया हो। इस विधि में भगवान जनार्दन स्वामी को ही साक्षी, पिता और पुत्र मानकर पिंड अर्पित किया जाता है।
सांसारिक मोह-माया से मुक्ति की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आत्म पिंडदान के बाद व्यक्ति को धार्मिक रूप से सांसारिक बंधनों और मोह-माया से मुक्त माना जाता है। इस अनुष्ठान के बाद व्यक्ति के लिए मृत्यु उपरांत अलग से पिंडदान की आवश्यकता नहीं मानी जाती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सामान्य जीवन नहीं जी सकता, बल्कि यह आध्यात्मिक मुक्ति से जुड़ा एक विधान है।
देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु और संन्यासी
गयाजी के इस अनोखे मंदिर में देश के कोने-कोने से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी ऐसे श्रद्धालु और संन्यासी पहुंचते हैं जो इस दुर्लभ धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करना चाहते हैं। पितृ पक्ष के दौरान गयाजी की इन पारंपरिक वेदियों पर तर्पण और पिंडदान का महात्मय और अधिक बढ़ जाता है, जो सनातन संस्कृति की गहरी जड़ों को दर्शाता है।
- गयाजी के भस्मकूट पर्वत स्थित जनार्दन स्वामी मंदिर में विशेष धार्मिक नियमों के तहत जीवित व्यक्ति अपना ‘आत्म पिंडदान’ कराते हैं।
- यह अनुष्ठान सभी के लिए नहीं है। आमतौर पर संन्यासी, महंत, या ऐसे लोग जो वैराग्य अपना चुके हैं और जिनके माता-पिता का निधन हो चुका है, वे धार्मिक नियमों के तहत यह विधि करते हैं।
- जनार्दन स्वामी मंदिर गयाजी की 45 पिंडवेदियों में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां पूर्वजों के स्थान पर जीवित व्यक्ति का आत्म पिंडदान कराया जाता है।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अनुष्ठान के बाद व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त माना जाता है और उसकी मृत्यु के बाद अलग से पिंडदान की आवश्यकता नहीं होती।
- गरुड़ पुराण सहित कई प्रमुख हिंदू धार्मिक ग्रंथों और कथाओं में इस विशेष पिंडदान का उल्लेख मिलता है।



