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Shardiya Navratri 2026: इस बार दो दिन रहेगी सप्तमी, एक ही दिन अष्टमी-नवमी? जानें पंचांग में क्यों घटती-बढ़ती हैं तिथियां

Shardiya Navratri 2026: इस बार शारदीय नवरात्रि में तिथियों का एक विशेष और दुर्लभ संयोग बन रहा है। पंचांगीय गणना के अनुसार, इस वर्ष नवरात्रि में सप्तमी की पूजा दो दिन यानी 17 और 18 अक्टूबर को होगी। वहीं, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। इसके ठीक अगले दिन 20 अक्टूबर को नवमी […]

इस बार शारदीय नवरात्रि में तिथियों का एक विशेष और दुर्लभ संयोग बन रहा है
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Shardiya Navratri 2026: इस बार शारदीय नवरात्रि में तिथियों का एक विशेष और दुर्लभ संयोग बन रहा है। पंचांगीय गणना के अनुसार, इस वर्ष नवरात्रि में सप्तमी की पूजा दो दिन यानी 17 और 18 अक्टूबर को होगी। वहीं, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी का पर्व मनाया जाएगा।

इसके ठीक अगले दिन 20 अक्टूबर को नवमी और दशमी दोनों तिथियां एक ही दिन पड़ रही हैं। इस वजह से श्रद्धालुओं के मन में तिथियों के इस फेरबदल को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।

अंग्रेजी कैलेंडर और हिंदू पंचांग में मूल अंतर

अक्सर लोग सोचते हैं कि जब अंग्रेजी कैलेंडर में हर तारीख 24 घंटे की होती है, तो हिंदू पंचांग में तिथियां छोटी या बड़ी क्यों हो जाती हैं। दरअसल, अंग्रेजी या ग्रीगोरियन कैलेंडर सौर चक्र और समय के निश्चित 24 घंटों पर आधारित होता है, जहाँ मध्यरात्रि 12 बजे तारीख बदल जाती है। इसके विपरीत, हिंदू पंचांग सूर्य और चंद्रमा के बीच की दीर्घांश दूरी (Longitudinal Distance) पर आधारित होता है। जब तक यह खगोलीय दूरी एक निश्चित पैमाने को पूरा नहीं करती, तब तक तिथि में बदलाव नहीं आता।

चंद्रमा की 12 डिग्री दूरी का वैज्ञानिक गणित

ज्योतिषाचार्य डॉ. दत्तात्रेय होस्केरे के अनुसार, आकाश में सूर्य और चंद्रमा के बीच जब 12 डिग्री का अंतर बनता है, तो एक तिथि पूरी मानी जाती है। अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही सीधी रेखा (0 डिग्री) पर स्थित होते हैं। जैसे-जैसे चंद्रमा आगे बढ़ता है और सूर्य से 12 डिग्री की दूरी तय कर लेता है, पंचांग में प्रतिपदा तिथि पूर्ण होकर द्वितीया प्रारंभ हो जाती है। सूर्य के सापेक्ष चंद्रमा का पूरा चक्र 360 डिग्री का होता है, जिसे 12-12 डिग्री के 30 विभाजनों में बांटा जाता है, जिससे एक चंद्र मास की 30 तिथियां बनती हैं।

19 से 26 घंटे तक बदल सकता है एक तिथि का समय

सूर्य और चंद्रमा के बीच इस 12 डिग्री की दूरी को तय करने में चंद्रमा को हमेशा एक समान समय नहीं लगता। खगोलीय स्थितियों के कारण कभी चंद्रमा इस दूरी को मात्र 19 घंटे में पूरा कर लेता है, तो कभी इसमें 26 घंटे या उससे भी अधिक का समय लग जाता है। जब कोई तिथि 24 घंटे से अधिक समय तक बनी रहती है और लगातार दो सूर्योदय को स्पर्श करती है, तो वह तिथि पंचांग में दो दिन दिखाई देने लगती है। यही कारण है कि इस बार सप्तमी तिथि दो दिन यानी 17 और 18 अक्टूबर तक बनी रहेगी।

चंद्रमा का अंडाकार पथ और गति का प्रभाव

चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा एक वृत्ताकार पथ पर नहीं, बल्कि अंडाकार (Elliptical) मार्ग पर करता है। इस दौरान पृथ्वी हमेशा इस पथ के केंद्र में नहीं होती, जिससे पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी घटती-बढ़ती रहती है। जब चंद्रमा पृथ्वी के निकट (Perigee) होता है, तो उसकी कक्षीय गति तेज हो जाती है और वह 12 डिग्री की दूरी न्यूनतम 19 घंटे में तय कर लेता है। इसके विपरीत, जब वह पृथ्वी से दूर (Apogee) होता है, तो उसकी गति धीमी हो जाती है और 12 डिग्री खिसकने में 26 घंटे का समय लग जाता है।

तिथियों के क्षय और वृद्धि का रहस्य

चंद्रमा की इसी बदलती गति के कारण पंचांग में ‘तिथि वृद्धि’ और ‘तिथि क्षय’ जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। जब कोई तिथि दो सूर्योदय के बीच ही शुरू होकर समाप्त हो जाती है और किसी भी सूर्योदय का स्पर्श नहीं कर पाती, तो उसे ‘तिथि का क्षय’ कहा जाता है। यही वजह है कि 20 अक्टूबर को नवमी और दशमी दोनों तिथियां एक ही दिन आ रही हैं। इसके विपरीत, जब कोई तिथि दो सूर्योदय तक बनी रहती है, तो उसे ‘तिथि की वृद्धि’ कहा जाता है, जैसा कि इस बार सप्तमी के साथ हो रहा है।

चंद्र मास और दो पूर्णिमाओं के बीच का अंतर

चंद्रमा को पृथ्वी का एक पूरा चक्कर (360 डिग्री) लगाने में लगभग 27 दिन का समय लगता है। हालांकि, जब चंद्रमा चक्कर लगा रहा होता है, तब पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा में आगे बढ़ चुकी होती है। इस कारण चंद्रमा को पुनः सूर्य के सापेक्ष उसी स्थिति में (जैसे पूर्णिमा से पूर्णिमा तक) आने के लिए लगभग 2 अतिरिक्त दिन तय करने पड़ते हैं। यही कारण है कि दो पूर्णिमाओं या दो अमावस्याओं के बीच लगभग 29.5 दिनों का समय लगता है, जिसे एक चंद्र मास कहा जाता है।

पर्व एवं त्योहारों पर पंचांग का धार्मिक प्रभाव

हिंदू धर्म परंपरा में व्रत और त्योहारों का निर्धारण उदयातिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) और शास्त्रों के कर्मकाल विधान के अनुसार किया जाता है। तिथियों के इस खगोलीय गणित के कारण ही कभी-कभी नवरात्रि आठ तो कभी दस दिनों की हो जाती है। इस वर्ष सप्तमी की वृद्धि और नवमी-दशमी के एक ही दिन पड़ने से पूजा-अनुष्ठान का समय पंचांग के नियमों के अनुसार ही तय किया जाएगा, जिससे साधकों को संपूर्ण फल की प्राप्ति हो सके।

Shravan Sharma
लेखक / पत्रकार:

Shravan Sharma

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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