Home ओपिनियन सप्रे शाला मैदान के दुश्मन कौन हैं ?

सप्रे शाला मैदान के दुश्मन कौन हैं ?

80
0
सप्रे शाला मैदान के दुश्मन कौन हैं ?

वैभव बेमेतरिहा

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बार फिर एक धरोहर संकट में है! ये धरोहर है सप्रे शाला मैदान। वह मैदान जिसके साथ स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन की यादें जुड़ी है, वह मैदान जो महात्मा गांधी का साक्षी है, वह मैदान जो छत्तीसगढ़ के महान विभूति, आजादी के नायक और छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के जनक के नाम पर है, वह मैदान जहाँ कई राष्ट्र नायकों ने अपनी सभाएं की हैं, वह मैदान जो प्रदेश में चले सबसे लंबे धरना-प्रदर्शन-आंदोलन का गवाह है, वह मैदान जहाँ पर सभा को संबोधित करते हुए भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की घोषणा की थी।

आज इस ऐतिहासिक धरोहर को चोट पहुँचाने, उसे मिटाने की कोशिशें हो रही हैं। मैदान की ऐतिहासिकता को दरकिनार कर निर्माण किया जा रहा है। हैरानी की बात ये है कि धरोहर को मिटाने का काम गाँधी के रास्ते पर चलने की बात कहने वाले ही कर रहे हैं। और इस बात को लेकर भी है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर धरोहर पर प्रहार क्यों? क्या मैदान को छोटा कर बूढ़ा तालाब को सँवारना सही है? सौंदर्यीकरण के नाम पर कहीं ये जन भावनाओं से खिलवाड़ तो नहीं?

ये वो तमाम सवाल हैं जो सप्रे शाला मैदान पर मंडराते खतरे को लेकर उठ रहे हैं। इन सबके बीच शहर के कुछ जज्बाती लोग, कुछ संवेदनशील लोग, वे लोग जिनके पुरखों ने रायपुर को सँवारा, सजाया है, वे लोग जो रायपुर की धरोहरों के साथ जुड़े रहे हैं, जो इन धरोहरों के बीच रहकर, इनके साथ जी कर बड़े हुए हैं, वे लोग जिन्हें अपने पुरखों की मान-मर्यादा, आन-बान-शान, सम्मान का ख्याल है, वे लोग जो इस माटी के सच्चे लाल हैं, वे आज सप्रे शाला मैदान को, बूढ़ा तालाब को बचाने जुट रहे हैं, घरों से निकल पड़े हैं। हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, फिलहाल मौन तरीके से अपना विरोध जता रहे हैं।

लेकिन शहरवासियों के इस ख़ामोशी को सिर्फ़ ख़माोशी समझने की भूल उन्हें नहीं करनी चाहिए जो सप्रे शाला मैदान को छोटा करने में लगे हैं, जो उन्हें तोड़ने-फोड़ने में लगे हैं। जो मैदान की ऐतिहासिकता के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं, ऐसे लोग को सबक सिखाने फिलहाल ज्ञापन, आग्रह और निवेदन का ही तरीका इन्होंने अपनाया है। लेकिन, ये सब उन्हीं के संतान हैं जिनके पुरखों ने देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी है। इनके रगों में वही खून आज भी दौड़ रहा है। बात अगर बात से न बनी तो ये सब सड़क पर आकर मोर्चा भी संभाल सकते हैं, धरोहर को बचाने सप्रे शाला में डेरा डाल सकते हैं।

मुखिया जी आप तलक भी सप्रे शाला मैदान को लेकर हो रही गतविधियों की पूरी जानकारी पहुँची होगी, आप भला कहाँ इन सबसे अनजान होंगे ? लगता है अब आपको ही कुछ करना होगा. क्योंकि आपकी ही पार्टी के नेता जनता की नहीं सुन रहे हैं। बेहतर है कि आप अपना मौन तोड़िए. धरोहर के साथ खिलवाड़ न हो ये बात शहर के प्रथम नागरिक से बोलिए। कुछ ऐसा ऐलान करिए कि धरोहरों के हित में कोई और ऐसा काम दोबारा न कर पाए। धरोहर, धरोहर ही रहे कभी भी कहीं भी मिट न पाए…