3 साल में 3.16 लाख लोगों को काट खाया डॉग…भाग रे भाग…!

रायपुर। 3 वर्षों में छत्तीसगढ़ में 3.16 लाख लोग डॉग बाइट (dog bite) के शिकार हुए। इनमें बिलासपुर में सबसे ज्यादा 1 लाख 10 हजार 925 और दूसरे नंबर पर रायपुर रहा जहां 23 हजार 669 तो तीसरे नंबर पर रहे बस्तर में 20 हजार 916 डॉग बाइट(dog bite) के मामले सामने आए। इसके बाद तो आदमी यही कहेगा कि इतने लोगों को काट खाया डॉग…भाग…रे भाग! ये आंकड़े सरकारी अस्पतालों के बताए जा रहे हैं। आंकड़ों पर अगर गौर करें तो हर साल लगभग 1 लाख लोगों को कुत्ते काटते(dog bite) हैं। रायपुर के महापौर प्रमोद दुबे की अगर मानें तो नगर निगम में रोजाना 25 कुत्तों का स्टेरलाइजेशन किया जाता है। इसके लिए बाकायदा गाड़ी और श्वान पकड़ने वाला दस्ता है। वहीं अस्पतालों में रैबीज के इंजेक् शन नदारद हैं। जो भी डॉग बाइट का पेशेंट हास्पिटलों में आता है उसे बाहर से जनरल पर्चेजिंग करवाई जाती है।
मरीजों को भगाया जाता है अस्पतालों से:
नारायणपुर के काकावाड़ा निवासी हेमंत अलामी की मौत भी डॉग बाइट से हुई। इसको लेकर रामकृष्ण आश्रम के महंत रायपुर के अंबेडकर अस्पताल आए थे। यहां से डॉक्टर्स ने उसे ये कहकर भगा दिया कि ये दो दिन ही जिएगा। अगर उस मौके पर उसका इलाज शुरू किया गया होता तो शायद वो हेमंत अलामी हमारे बीच होता। दु:खद बात तो ये है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आदेश के बावजूद भी स्वास्थ्य विभाग का अमला बच्चे तक नहीं पहुंच पाया। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल होने का दावा करने वाले अस्पताल की असलियत ये है कि यहां से मरीजों को भगाया जाता है।
मिशन कमीशन है पीछे का कारण:
नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर अंबेडकर अस्पताल के ही एक स्टॉफ ने बताया कि इसके पीछे भी मिशन कमीशन का खेल है। यहां से भगाए जाने पर मरीजों को बाहर बैठे दलाल दबोच लेते हैं। उनको बरगलाकर प्राइवेट अस्पतालों में जाने की सलाह दे डालते हैं। मरीज के परिजन प्राइवेट अस्पतालों में अपने जेब कटवाने पर मजबूर होते हैं।

पेटा एक्ट बना गले की फांस: महापौर
नगर पालिक निगम के महापौर प्रमोद दुबे ने कहा कि कुत्तों को मारा नहीं जा सकता। इसके लिए पेटा एक्ट बनाया गया है। अलबत्ता रोज बैरनबाजार अस्पताल में 25 कुत्तों का स्टेरलाइजेशन किया जा रहा है। उनको उन्हीं के इलाके में छोड़ना भी बड़ी चुनौती रहती है।
निगम के महापौरों की लाचारी: तिवारी
पूर्व नेता प्रतिपक्ष सुभाष तिवारी ने कहा कि इसके पीछे नगर निगम की लचर व्यवस्था जिम्मेदार है। आदमी हैं अस्पताल है वाहन हैं एक्सपर्ट डॉक्टर्स हैं फिर भी काम नहीं होना इनकी कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है। शहर के भीतरी और आउटर इलाकों में कुत्ते इतने तेज हो गए हैं कि चाहे वो बच्चा हो या फिर जवान अकेले मिलते ही उस पर झुण्ड बनाकर हमला कर देते हैं। वहीं जानवरों के छोटे बच्चों को तो कई बार नोंच-नोंच कर खा जाते हैं।
अस्पतालों में रैबीज के वैक्सीन की हो व्यवस्था:
ये सरकार का दायित्व बनता है कि सभी सरकारी अस्पतालों में रैबीज जैसी घातक बीमारी से निपटने के लिए इसका इंजेक् शन होना नितांत आवश्यक है। इसके अलावा डॉक्टर्स को भी चाहिए कि वे ऐसे मरीजों का जीवन बचाने पर पहले जोर दें। उसके बाद ही कुछ दूसरा सोचें।
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