सीएम भूपेश बघेल ने रायपुर में किया ध्वजारोहण, कहा. ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ वास्तव में आजादी के दीवानों के सपनों का ‘भारत’ , 4 नए जिले व 18 नई तहसीलों की घोषणा

रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आज राजधानी रायपुर के पुलिस परेड ग्राऊण्ड में आयोजित मुख्य समारोह में ध्वजारोहण किया। उन्होंने प्रदेश की जनता के नाम अपने संदेश का वाचन किया और प्रदेशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाएं दी।

इस दौरान सीएम ने विकेन्द्रीकरण के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए और जिलों का पुनर्गठन करते हुए चार नये जिले ‘मोहला-मानपुर’, ‘सक्ती’, ‘सारंगढ़-बिलाईगढ़’ तथा ‘मनेन्द्रगढ़’ के गठन की घोषणा की।

18 नई तहसीलों की घोषणा

सीएम ने  नांदघाट,सोहेला,सीपत,बोदरी, बिहारपुर,चांदो,रधुनाथ नगर, डौरा- कोचली ,कोटमी- सकोला,सरिया,छाल,अजगरबहार, बरपाली,अहिवारा सरोना,कोरर,बारसुर ,मर्दापाल,धनोरा,अड़भार,गंगलूर,कुटरू , लालबहादुर नगर,तोंगपाल को नई तहसील बनाने की घोषणा की।

प्रमुख घोषणाएं

प्रदेश की जनता के नाम अपने संदेश में सीएम ने कहा कि राजस्व संबंधी कामकाज की जटिलता से जनता को राहत दिलाने के लिए नामांतरण की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाएगा। सभी जिला मुख्यालयों एवं नगर-निगमों में एक उद्यान सिर्फ महिलाओं के लिए विकसित किया जाएगा, जो ‘मिनीमाता उद्यान’ के नाम से जाना जाएगा। प्रचलित व्यवस्था के अनुसार प्रदेश के महाविद्यालयों में, स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयु-सीमा का बंधन है। उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ने वाले युवाओं के हित में आयु-सीमा के इस बंधन को समाप्त करने की घोषणा ।

मुख्यमंत्री सस्ती दवा योजना’ नगरीय क्षेत्रों में लागू

उन्होेंने कहा कि प्रदेश की जनता को रियायती दर पर दवा उपलब्ध कराने के लिए ‘मुख्यमंत्री सस्ती दवा योजना’ नगरीय क्षेत्रों में लागू है। अब यह ‘श्री धन्वन्तरी योजना’ के नाम से जानी जाएगी।बिजली कंपनियों में विभिन्न पदों पर 2 हजार 500 से अधिक कर्मियों की भर्ती की जाएगी। ‘डायल 112’ सेवा की उपयोगिता को देखते हुए इसका विस्तार अब पूरे प्रदेश में किया जाएगा।

मुख्यमंत्री भूपेश ने कहा, 15 अगस्त 1947 को हमें आजादी मिली थी और आज के दिन हम 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। यह हम सबके लिए बहुत सौभाग्य की बात है। भारत ने दो शताब्दी से अधिक समय तक अंग्रेजों की प्रताड़ना और उनका शासन सहा है। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए भारत माता के हजारों-हजार सपूतों और सुपुत्रियों ने अपना सर्वस्व त्याग किया। हंसते-हंसते बलि-वेदी पर चढ़ गए। उन वीरों को याद करते ही हमारी नसों में अपने महान पुरखों का खून उबलने लगता है और उन सबके त्याग के बारे में सोचकर आंखें नम हो जाती हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ ही एक के बाद एक हजारों चेहरे नजरों के सामने आने लगते हैं।

अमर शहीदों को किया नमन

अमर शहीद गैंदसिंह, वीर नारायण सिंह, मंगल पाण्डे, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मी बाई, वीरांगना अवंति बाई लोधी, लाल-बाल-पाल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुुल कलाम आजाद जैसे नामों का एक कारवां बनता चला जाता है।

हमारे छत्तीसगढ़ के वीर गुण्डाधूर, पं. रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव, डॉ. खूबचंद बघेल, पं. सुंदरलाल शर्मा, डॉ. ई.राघवेन्द्र राव, क्रांतिकुमार, बैरिस्टर छेदीलाल, लोचन प्रसाद पाण्डेय, यतियतन लाल, मिनीमाता, डॉ. राधाबाई, पं. वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, अनंतराम बर्छिहा, मौलाना अब्दुल रऊफ खान, हनुमान सिंह, रोहिणी बाई परगनिहा, केकती बाई बघेल, श्रीमती बेला बाई जैसे अनेक क्रांतिवीरों और मनीषियों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज मैं एक बार फिर इन सभी को सादर नमन करता हूं।

सपूतों की कुर्बानी को किया याद

सीएम ने अपने संदेश में कहा कि भारत में सामाजिक सौहार्द्र, नागरिकों के बीच एकता और देश की अखण्डता को बचाए रखने के लिए भी अनेक सपूतों ने कुर्बानी दी। उत्तरप्रदेश में गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद हुए थे, उन्हीं मूल्यों और सिद्धांतों के लिए महात्मा गांधी, श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी शहीद हुए।

शहादत की यह परंपरा इतनी विस्तृत है कि हर प्रदेश में, ऐसी हस्तियों की यादें समाई हुई हैं, जिन्हें सिर्फ आज के दिन ही नहीं बल्कि हर दिन याद करने और उनके बताए रास्ते पर चलने की जरूरत है। देश की सीमाओं की चौकसी करने वाले सैनिकों और देश के भीतर सुरक्षा बलों में काम कर रहे लाखों जवानों को भी मैं नमन करता हूं, मोर्चों पर जिनकी मौजूदगी से हम सुरक्षित महसूस करते हैं।

‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ वास्तव में आजादी के दीवानों के सपनों का भारत

अपने संदेश में सीएम ने कहा कि 75वां स्वतंत्रता दिवस एक ऐसा पड़ाव है, जहां पर खड़े होकर हमें अपनी विरासत पर गर्व भी होता है और जिसके आगे ‘नवा भारत’ गढ़ने की जिम्मेदारी भी हमें उठानी है। मुझे खुशी है कि अपनी धरोहर का सम्मान करते हुए हमने ‘नवा छत्तीसगढ़’ गढ़ने का जो अभियान पौने तीन वर्ष पहले शुरू किया था, उसका असर न सिर्फ हमारे प्रदेश में दिख रहा है, बल्कि नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने के हमारे प्रयासों ने पूरे देश में भी एक नई उम्मीद जगाई है। मुझे यह कहते हुए भी बहुत खुशी हो रही है कि विकास का ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ वास्तव में आजादी के दीवानों के सपनों को साकार कर रहा है।

जनता के नाम संदेश के प्रमुख अंश

सीएम ने कहा कि विकास की हमारी समझ, उन मानवीय मूल्यों से प्रेरित है, जो आजादी के आंदोलन की बुनियाद थे। आइए, एक बार फिर याद करें हमारे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अमर वचन। सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने कहा था-हिंसक तरीकों से हमेशा हिंसक आजादी ही मिलेगी और यह भारत तथा दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करेगी।

शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा था- हमारे व्यक्तियों को कुचलकर वे हमारे विचारों को नहीं मार सकते।नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था- हमारे बलिदान और मेहनत से जो स्वतंत्रता मिलती है, उसे हम अपनी सामर्थ्य से बचाकर रख सकते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था-हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए, जहां से अनुशासन और स्वतंत्रता दोनों का जन्म होता है।

लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था- आजादी की रक्षा करना केवल सैनिकों का ही काम नहीं बल्कि पूरे देश को मजबूत होना होगा। और प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने पहले भाषण में कहा था-जब तक लोगों की आंखों में आंसू हैं तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा।

मैं कहना चाहता हूं कि हमारे पुरखों और महान नेताओं के संदेश में इतनी ताकत थी कि उनसे हमारे देश के संस्कार गढ़े गए। उन्हीं संस्कारों की बदौलत हम ‘नवा छत्तीसगढ़’ गढ़ रहे हैं। सत्य, अहिंसा, शांति, करुणा, संवेदनशीलता, गरीबों के आंसू पांेछना और कमजोर तबकों को शक्ति देना ही हमारी पहली प्राथमिकता है।

भाइयों और बहनों, छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद यह सुअवसर मिला था कि राज्य के हर हिस्से में विकास के असंतुलन को समाप्त कर दिया जाए, लेकिन विडम्बना है कि इस दिशा में सही सोच के साथ सही प्रयास नहीं किए गए। हमने देखा कि ग्रामीण और वन क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों के उपयोग और स्थानीय लोगों की भागीदारी से इन अंचलों में तेजी से विकास किया जा सकता है, जिससे गांवों और शहरों के बीच बन गई गहरी खाई को पाटा जा सके।

यह भी एक विडम्बना ही रही कि वन अधिकार अधिमान्यता पत्र वितरण से आदिवासी और परंपरागत वन निवासी समुदायों को जमीन का जो अधिकार मिल सकता था, वह भी सही ढंग से नहीं दिया गया। हमने न्याय की शुरुआत इसी मुद्दे से की थी।

आज मुझे यह कहते हुए खुशी है कि हमने मात्र पौने तीन वर्षों में एक ओर जहां निरस्त दावों की समीक्षा करके बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र दिए, वहीं दूसरी ओर 44 हजार से अधिक सामुदायिक और 2 हजार 500 से अधिक सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र दिए हैं। इतना ही नहीं, नगरीय क्षेत्रों में भी वन अधिकार पत्र देने वाला अग्रणी राज्य हमारा छत्तीसगढ़ बन गया है।

लोहंडीगुड़ा के बाद स्थानीय लोगों को अपनी जमीन का हक दिलाने की यह एक बड़ी मिसाल है। इतना ही नहीं, अब वन अधिकार की जमीनों पर धान उपजाने या वृक्ष लगाने वाले लोगों को भी ‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना’ और ‘मुख्यमंत्री वृ़़क्षारोपण प्रोत्साहन योजना’ से जोड़ा गया है।

आदिवासी और वन आश्रित परिवारों के जीवनयापन का सबसे बड़ा सहारा वनोपज है, लेकिन पहले तेन्दूपत्ता संग्राहकों को मात्र 2 हजार 500 रुपए प्रति मानक बोरा पारिश्रमिक दिया जाता था, जिसे हमने बढ़ाकर 4 हजार रुपए किया। पहले मात्र 7 लघु वन उपजों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता था। हमने 52 लघु वनोपजों को समर्थन मूल्य पर खरीदने की व्यवस्था की है। इनमें से 17 उपजों की दरें हमने बढ़ाई। इस तरह से 500 करोड़ रुपए से अधिक सालाना अतिरिक्त आमदनी हमारे आदिवासी एवं वन आश्रित परिवारों को प्राप्त हो रही है।

भारत सरकार द्वारा की गई विस्तृत समीक्षा के हवाले से मैं सिर्फ एक उदाहरण देना चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ ने बीते दो वर्षों में 1 हजार 173 करोड़ रुपए की लघु वनोपज खरीदी है, जो कि देश में कुल खरीदी का 74 प्रतिशत है।

भारत सरकार ने वन-धन तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा की तो पाया कि छत्तीसगढ़ 10 मापदण्डों में देश में अग्रणी है। इतना ही नहीं 15 महिला स्वसहायता समूहों को भी वनोपज के कामकाज में उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कृत किया गया है। हम जिस बदलाव की बात करते थे, उसकी तस्दीक अब राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है, जिसके लिए मैं वन क्षेत्रों में रहने वाले सभी भाइयों-बहनों, स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाओं और युवा साथियों को बधाई देता हूं कि स्वावलम्बन की दिशा में उन्होंने बड़ी मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाए हैं।

स्थानीय संसाधनों और परंपरागत कौशल को निखारकर जनता के आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण के लिए लगातार नए कदम उठाए जा रहे हैं, जिसके तहत अब ‘रजककार विकास बोर्ड’, ‘लौह शिल्पकार विकास बोर्ड’, ‘तेलघानी विकास बोर्ड’, ‘चर्म शिल्पकार विकास बोर्ड’ जैसी संस्थाओं का गठन किया जा रहा है।

जब हम विषमताएं मिटाने की बात करते हैं तो किसान और ग्रामीण जन-जीवन से जुड़ी आजीविका के साधन पर हमारा ध्यान सबसे पहले जाता है। हमने ‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना’ के माध्यम से जो शुरुआत की थी, उसे अब न्याय देने की दीर्घकालीन व्यवस्था में बदल दिया है।

यहां तक कि धान तथा धान के बदले अन्य निर्धारित फसलें और वृक्ष लगाने पर भी इस योजना का लाभ दिया जाएगा। इस पहल के बाद गांव-गांव से विविध फसलें तथा वृक्षारोपण की खबरें आनी शुरू हो गई हैं, जो वन और ग्रामीण अंचलों में आर्थिक मजबूती का शुभ संकेत है।

मैं बार-बार कहूंगा कि छत्तीसगढ़ के किसानों की जान धान में बसती है, इसलिए हमने धान खरीदी को भी न्याय का मुद्दा बनाया। विगत एक वर्ष में 263 नए धान खरीदी केन्द्र खोले गए और 20 लाख 53 हजार किसानों से 92 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी समर्थन मूल्य पर की गई। इस तरह से किसानों को समर्थन मूल्य के हिसाब से 17 हजार 240 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया, जो छत्तीसगढ़ के इतिहास में अब तक सबसे बड़ा कीर्तिमान है।

‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना’ के तहत पहले वर्ष में 5 हजार 628 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि समर्थन मूल्य पर धान सहित विभिन्न फसलें बेचने वाले किसानों को दी गई है। योजना के दूसरे वर्ष में भी पहली किस्त के रूप में 1500 करोड़ रुपए से अधिक राशि दी जा चुकी है, और मेरा वादा है कि इस वर्ष भी 5 हजार 703 करोड़ रुपए की राशि चार किस्तों में दी जाएगी। किसानों को न्याय दिलाने के रास्ते पर आने वाली हर बाधा का, हम न केवल सामना करेंगे बल्कि जीतेंगे भी, यह मेरा परम विश्वास है।

पहले हमने 1 नवम्बर 2018 की स्थिति में 17 लाख से अधिक किसानों की लंबित सिंचाई जलकर राशि 244 करोड़ रुपए माफ किए थे और अब एक बार फिर 30 जून 2020 तक लंबित सिंचाई जलकर की राशि लगभग 80 करोड़ रुपए माफ करने का निर्णय लिया है।

‘सुराजी गांव योजना’ के माध्यम से ‘नरवा-गरुवा-घुरुवा-बारी’ के संरक्षण और विकास में मिल रही सफलता मील का पत्थर है। इसके विस्तार में ‘गोधन न्याय योजना’ से गौवंश के संरक्षण, गौठान की गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला है। जब गोबर के कामकाज से बरसने वाला धन, सवा सौ करोड़ रुपए के पार हो गया है तो आज मैं यह कहना चाहता हूं कि हमने गोबर को गोधन बनाकर दिखा दिया है।

मैं दावे के साथ कहता हूं कि गोधन ग्रामीण व शहरी जरूरतमंद तबकों के लिए वरदान साबित होगा। वर्मी कम्पोस्ट, सुपर कम्पोस्ट, सुपर कम्पोस्ट प्लस जैसे नए उत्पाद अब ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि के सूत्रधार बन रहे हैं। इस सफलता से यह विश्वास हो गया है कि हम छत्तीसगढ़ की माटी को जहरीले रसायनों से आजादी दिलाने में भी सफल होंगे और अच्छे पोषणयुक्त खाद्यान्नों के उत्पादन में भी नया मुकाम हासिल करेंगे। मैं बहुत विनम्रता और भरे हुए दिल से कहना चाहता हूं कि भूमिहीन कृषि मजदूरों की व्यथा को नहीं समझा जाना अमानवीयता की श्रेणी में आएगा।

मुझे संतोष है कि देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सालभर होने वाले कार्यक्रमों में जब देश राष्ट्रीय पर्व का उल्लास मनाएगा तो उसमें हमारे छत्तीसगढ़ के वे मजदूर भी शरीक होंगे, जिन्हें ‘राजीव गांधी ग्रामीण भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना’ का लाभ मिलेगा। इस योजना के तहत लगभग 10 लाख मजदूर भाई-बहनों को 6 हजार रुपए सालाना अनुदान सहायता दी जाएगी।

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