0 शमी इमाम
रायपुर। कांग्रेस पार्टी में लंबे समय से उपेक्षित वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम ने खुद को पार्टी का प्राथमिक सदस्य जरूर बताया मगर उन्होंने खुद को कांग्रेस से अलग करने की बात भी कह डाली। TRP NEWS से बातचीत में नेताम ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि अब वे समाज की राजनीति करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रदेश में आदिवासी समाज की काफी उपेक्षा हो रही है और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ना मेरी पहली प्राथमिकता रही है।

मुख्यमंत्री ने जब से ये कहा, तब से मैंने…

अरविन्द नेताम ने बताया कि एक बार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मीडिया के समक्ष ही कहा था कि अरविन्द नेताम को अब राजनीति से रिटायर हो जाना चाहिए। तब से उन्होंने (अरविन्द नेताम) कांग्रेस पार्टी में सक्रियता छोड़ दी है। नेताम के मुताबिक CM के बयान के बाद मुझे न तो जिला स्तर पर और न ही राज्य स्तर पर पार्टी की बैठकों में बुलाया गया, और न ही पत्राचार किया गया। जब उन्हें यह समझ आया कि पार्टी को उनकी जरुरत नहीं है, तब से वे भी समाज के काम में लग गए हैं।

आदिवासी विधायकों की भूमिका से समाज नाराज

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम ने कहा कि एक दौर था जब आदिवासी समाज के साथ कुछ गलत होने पर वे इंदिरा गांधी के सामने भी कह जाया करते थे कि ये गलत हो रहा है। आज ”पेसा” कानून में आदिवासी समाज की उपेक्षा और आदिवासियों का आरक्षण कानून ध्वस्त हो गया, मगर इस मुद्दे पर कांग्रेस से जुड़े किसी भी आदिवासी विधायक ने अपना मुंह नहीं खोला। वे किस बात के प्रतिनिधि हैं ? उनके लिए सीट इसलिए आरक्षित होती है कि वे विधानसभा में आदिवासी समाज के प्रतिनिधि के तौर सरकार के समक्ष अपनी बात रखें। आदिवासी विधायकों की इस भूमिका से समाज के लोग काफी नाराज हैं।

समाज का दूसरा संगठन “सरकारी”

प्रदेश में छग सर्व आदिवासी समाज के कई संगठन होने के सवाल पर अरविन्द नेताम ने कटाक्ष करते हुए कहा कि एक संगठन तो “सरकारी” है। भारत सिंह की अध्यक्षता वाले संगठन का नाम लेकर उन्होंने कहा कि उन्हें सरकार जैसा बोलती है, वे वैसा ही बयान जारी करते हैं। नेताम ने कहा कि वे मध्यप्रदेश के शासनकाल से देखते आ रहे हैं कि उनके समाज का संगठन जब-जब उठ खड़ा हुआ है तब उसमे फूट डालने की कोशिश हुई है। आज भी ऐसा ही हो रहा है।

बता दें कि छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के एक धड़े के अध्यक्ष सोहन पोटाई हैं, जो पूर्व में भाजपा सांसद रह चुके हैं और अब वे पूरी तरह अपने संगठन के बैनर तले समाज के लिए काम कर रहे हैं। इसी संगठन से पूर्व कांग्रेस सांसद और केंद्र में मंत्री रह चुके अरविन्द नेताम जुड़े हुए हैं। समाज के इसी संगठन ने अपना प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारा है।

आदिवासी समाज के लिए प्रयोग है भानुप्रतापपुर चुनाव

अरविन्द नेताम ने कहा कि भानुप्रतापपुर उपचुनाव एक तरह से आदिवासी समाज के लिए टेस्ट केस की तरह है, देश में पहली बार आदिवासी समाज के समर्थन से किसी को चुनाव लड़ाया जा रहा है। इसके लिए नाम वापिसी के आखिरी दिन आसपास के 4- 5 जिलों के आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों की बैठक हुई थी। इस दौरान सभी आदिवासी प्रत्याशियों से चर्चा हुई, सभी इस बात पर सहमत थे कि सर्व आदिवासी समाज की ओर से एक ही प्रत्याशी मैदान में खड़ा होगा। बैठक में पैनल बनाया गया और पूर्व IPS अधिकारी अकबर राम कोर्राम का नाम तय किया गया। इसके बाद उनके समर्थन में शेष प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिया।

चुनाव में होगा तगड़ा मुकाबला

अरविन्द नेताम ने कहा कि प्रदेश में राजनीती के क्षेत्र सबसे जागरूक इलाके के रूप में भानुप्रतापपुर को माना जाता है। यहां 1952 में हुए देश के पहले चुनाव में ही मतदाताओं ने कांग्रेस के पसीने छुड़ा दिए थे। फ़िलहाल इस बार यहां का चुनाव परिणाम क्या होगा इसके बारे में बोलने से बचते हुए अरविन्द नेताम ने कहा कि समाज पहली बार चुनाव लड़ रहा है, और इससे पहले तक लोग किसी न किसी पार्टी के खूंटे से बंधे हुए थे। इस बार यहां समाज के लोग एकजुट हैं। वे भी कल से भानुप्रतापपुर में सर्व आदिवासी समाज के प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में जुट जायेंगे।

बहरहाल भानुप्रतापपुर में आदिवासी समाज जिस तरह से सक्रिय हुआ है, वो कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए परेशानी का सबब बनेगा। अब तक यहां कांग्रेस-भाजपा के बीच मुकाबला नजर आ रहा था, मगर आदिवासी संगठन ने जैसे ही अपने प्रत्याशी को मैदान में उतारा है, उससे यहां अब त्रिकोणीय मुकाबले के आसार दिखाई दे रहे हैं।

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