नेशनल डेस्क। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात समेत 13 राज्यों के लगभग 200 टोल प्लाजा के कंप्यूटरों में एनएचएआई के सॉफ्टवेयर की तरह एक और सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करके बिना फास्ट टैग वाली गाड़ियों से करोड़ों की टोल टैक्स चोरी की गई है।

उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने सॉफ्टवेयर बनाने वाले इंजीनियर और टोल प्लाजा के दो मैनेजरों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपी आलोक सिंह से पूछताछ में सामने आया कि यह घोटाला पिछले दो वर्षों से चल रहा था, जिससे एनएचएआई को करीब 120 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इस मामले में रीजनल ऑफिस ने सभी अधिकारियों को अलर्ट किया है और जांच के निर्देश जारी किए हैं।

पंजाब के खरड़-लुधियाना हाईवे स्थित घुलाल और बठिंडा-अमृतसर हाईवे स्थित जीदा टोल प्लाजा भी इस घोटाले में शामिल हैं। साथ ही टोल टैक्स के ठेकेदारों की मिलीभगत की जानकारी भी मिली है। एसटीएफ ने घोटाले के मास्टरमाइंड आलोक सिंह के साथ तीन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि गिरोह के अन्य सदस्य फरार हैं।

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क्या हैं नियमः
टोल से गुजरने वाले फास्ट टैग रहित वाहनों से दोगुना टोल लिया जाता है। इसका 50 प्रतिशत एनएचएआई और 50 प्रतिशत निजी कंपनी या ठेकेदार को मिलता है। लेकिन आलोक द्वारा बनाए गए सॉफ्टवेयर से जब टोल वसूला गया, तो एनएचएआई को उसका हिस्सा नहीं मिला, बल्कि पूरा पैसा वो और उसके बनाए गए सिंडिकेट ने गबन किया।

एसटीएफ के एसएसपी विशाल विक्रम सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश के अतरैला शिव गुलाम टोल प्लाजा और मीर्जापुर में इस सॉफ्टवेयर से रोजाना औसतन 45 हजार रुपये की टोल चोरी हो रही थी।

आलोक सिंह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, जो पहले एनएचएआई के सॉफ्टवेयर बनाने और इंस्टॉल करने का काम करता था। टोल प्लाजा पर काम करते हुए ही उसने ठेकेदारों से संपर्क किया और सॉफ्टवेयर के जरिए धोखाधड़ी शुरू कर दी।

नकली सॉफ्टवेयर से निकाली गई टोल टैक्स की पर्ची एनएचएआई जैसी दिखती थी, ताकि किसी को शक न हो। बिना फास्ट टैग के गुजरने वाले वाहनों में से 5 प्रतिशत को एनएचएआई के सॉफ्टवेयर पर दर्ज किया जाता था, जबकि बाकी वाहनों से दोगुना टोल लिया जाता और उन्हें टोल फ्री श्रेणी में रखा जाता था।

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एसटीएफ के मुताबिक, आलोक सिंह ने 42 टोल प्लाजा पर नकली सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किए हैं, जिनमें 9 उत्तर प्रदेश, 6 मध्य प्रदेश, 4-4 राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, 3 झारखंड, 2-2 पंजाब, असम, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, और 1-1 ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और तेलंगाना में हैं। यानी यह घोटाला 13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में फैला हुआ है। आलोक ने बताया कि उसके साथियों सावन्त और सुखान्तु ने करीब 200 टोल प्लाजा पर ऐसे सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किए हैं।