टीआरपी डेस्क। हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित जटोली शिव मंदिर न केवल अपनी 122 फीट की ऊंचाई के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ के पत्थरों से निकलने वाली रहस्यमयी डमरू की ध्वनि श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। इस महाशिवरात्रि पर देश-विदेश से हजारों पर्यटकों के यहाँ पहुँचने की उम्मीद है, जो इस ‘एशिया के सबसे ऊंचे शिव मंदिर’ के दर्शन करेंगे।
श्रद्धालु जो इस महाशिवरात्रि पर किसी दिव्य और ऊंचे स्थान की यात्रा का प्लान बना रहे हैं, उनके लिए जटोली एक श्रेष्ठ विकल्प है। यह मंदिर आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ स्थापत्य कला का वह बेजोड़ नमूना है, जो छत्तीसगढ़ की अपनी समृद्ध मंदिर संस्कृति से जुड़ाव महसूस कराता है।
मंदिर का इतिहास और द्रविड़ शैली की वास्तुकला
हिमाचल की वादियों में स्थित इस भव्य मंदिर को पूरी तरह तैयार होने में करीब 39 साल का लंबा वक्त लगा। स्वामी कृष्णानंद परमहंस के मार्गदर्शन में निर्मित यह मंदिर द्रविड़ शैली में बना है, जिसकी बारीक नक्काशी देखने योग्य है। हाल ही में मंदिर के शिखर पर 11 फीट का स्वर्ण कलश स्थापित किया गया है, जिससे इसकी कुल ऊंचाई 122 फीट हो गई है, जो इसे एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर बनाती है।
पत्थरों में महादेव का संगीत और चमत्कारी जलकुंड
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके पत्थर हैं, स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का दावा है कि पत्थरों को थपथपाने पर उनमें से साक्षात महादेव के डमरू जैसी आवाज आती है। मंदिर परिसर के पास ही एक पवित्र जलकुंड है। लोक मान्यता है कि 1950 के दशक में पानी की किल्लत दूर करने के लिए स्वामी जी की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने त्रिशूल के प्रहार से यहाँ जलधारा प्रकट की थी। माना जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है।


