रायपुर। आंगनबाड़ी केंद्रों के नाम पर चल रही सक्षम आंगनबाड़ी योजना अब सीधे-सीधे भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और नियमों से खिलवाड़ के आरोपों में घिर गई है। महिला एवं बाल विकास विभाग पर आरोप है कि करीब 16.61 करोड़ रुपये की भारी-भरकम खरीद को 155 टुकड़ों में बांटकर ऐसा रास्ता तैयार किया गया, जिससे खुली प्रतिस्पर्धा, पारदर्शी टेंडर और सस्ती दरों की पूरी संभावना खत्म हो जाए। सवाल अब सिर्फ गड़बड़ी का नहीं, बल्कि सोची-समझी लूट का उठ रहा है।

2899 आंगनबाड़ी केंद्रों में टीवी और आरओ लगाने जैसी बड़ी खरीद को एकीकृत टेंडर से करने के बजाय ब्लॉक स्तर पर 10, 13, 15, 20 केंद्रों के छोटे-छोटे पैकेज बनाकर बांट दिया गया। साथ ही खरीदी के पैसें सीधा ब्लॉक अधिकारी (CDPO) के खाते में डाल दिए गए है। आखिर क्यों? क्या बड़े टेंडर में बड़ी कंपनियां आ जातीं, रेट नीचे आ जाते और कमीशन का खेल बिगड़ जाता? यही वह सवाल है जो अब विभाग की नीयत पर सबसे बड़ा दाग बनकर खड़ा है।

सबसे बड़ा शक इस बात पर है कि 25 हजार तक टीवी, 10 हजार तक आरओ जैसी सीमा तो तय कर दी गई, लेकिन ब्रांड, मॉडल, तकनीकी स्पेसिफिकेशन, BIS मानक, वारंटी और गुणवत्ता पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए। यहां तक कि ख़रीदे गए ब्रांड इंटरनेट में भी ढूंढने से नहीं मिल रहे। यानि मैदान पूरी तरह खुला है- जहां चाहो, जैसा चाहो, वैसा सामान खरीदो। इससे यह आशंका और मजबूत होती है कि बच्चों के नाम पर घटिया माल, महंगे दाम और मोटा कमीशन यही असली खेल है।

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मार्केट में 15000 रु तक उपलब्ध ब्रांडेड TV

सबसे हैरानी की बात ये है कि 25000 हजार में TV खरीदने का ऑर्डर जारी किया गया है। जिसमें ब्रांड के नाम का जिक्र भी नहीं किया गया। ऐसे में जिस कंपनी को कोई जानता भी नहीं ऐसे नामों वाली TV खरीदी गई। जबकि मार्केट में LG और सैमसंग जैसी ब्रांडेड कंपनियों की टीवी 15000 रु से भी कम में उपलब्ध है।

क्या है नियम ?

भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के Compulsory Registration Order (CRO) के मुताबिक, बिना BIS रजिस्ट्रेशन और Standard Mark के कोई भी एलईडी टीवी भारत में बेचा नहीं जा सकता। एलईडी टीवी के लिए IS 616:2017 सुरक्षा मानक लागू है, जो बिजली का झटका, आग लगने और अन्य इलेक्ट्रॉनिक जोखिमों से सुरक्षा सुनिश्चित करता है। लेकिन सक्षम योजना में कई जगह सिर्फ 25 हजार रुपये तक का टीवी खरीदने की सीमा तय किए जाने की जानकारी सामने आई है, जबकि ब्रांड, मॉडल, BIS रजिस्ट्रेशन नंबर और तकनीकी स्पेसिफिकेशन का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या खरीदे जा रहे टीवी BIS मानकों के अनुरूप हैं या नहीं। अब मांग तेज हो गई है कि हर टीवी का BIS नंबर सार्वजनिक किया जाए, सप्लाई से पहले गुणवत्ता जांच हो और पूरी खरीद प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए।

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मामला यहीं नहीं रुकता। सूत्र बताते है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने से ठीक पहले खरीद, सप्लाई, इंस्टॉलेशन, बिल एंट्री और भुगतान तक निपटाने का दबाव बनाया गया। तीन दिन में करोड़ों की खरीद? क्या यह सरकारी प्रक्रिया थी या पहले से तय बंदरबांट का आखिरी चरण? इतने कम समय में निष्पक्ष कोटेशन, गुणवत्ता जांच और पारदर्शी भुगतान की बात करना जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।

विभाग ने दिया ये तर्क

सक्षम आंगनबाड़ी योजना के तहत आरओ और एलईडी टीवी खरीदी पर उठे सवालों के बीच महिला एवं बाल विकास विभाग ने स्पष्ट किया है कि पूरी प्रक्रिया केंद्र सरकार के प्रावधानों और राज्य के वित्तीय नियमों के तहत की जा रही है। विभाग के अनुसार 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार से मदर सैंक्शन मिलने के बाद ही खरीदी प्रक्रिया शुरू हुई। एलईडी टीवी, आरओ, वॉल पेंटिंग और रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए राशि भी केंद्र सरकार ने तय की है, जबकि एलईडी टीवी के लिए न्यूनतम 32 इंच का मानक रखा गया है। विभाग का कहना है कि सभी खरीदी जेम पोर्टल और निर्धारित वित्तीय नियमों के तहत पारदर्शिता के साथ की जा रही है।

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आरोपों की जांच जरुरी

GFR, CVC और GeM जैसे नियमों की भावना को अनदेखी कर अगर करोड़ों की खरीदी टुकड़ों में बांटी गई है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं सिस्टम के भीतर बैठी संगठित लूट का संकेत है। अब जरूरत है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच, खरीदे गए हर सामान का रेट-ऑडिट, और जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय हो।