रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्कूली बच्चों का सफर अब किस्मत के भरोसे चल रहा है। टाटीबंध से लेकर नेहरू नगर और बिलासपुर के तिफरा तक, सड़कों पर दौड़ती बसें और ऑटो अक्सर मातम बिछा रहे हैं। तेलंगाना ने अपने बच्चों को बचाने के लिए लंदन मॉडल और AI का सहारा लिया है, लेकिन छत्तीसगढ़ में केवल हादसों के बाद जांच का झुनझुना थमा देता है।
छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के डेटा के अनुसार प्रदेश में 56, 000 से अधिक सरकारी स्कूल और इनमें 6,900 से अधिक निजी (प्राइवेट) स्कूल हैं। इन स्कूलों में 38 लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। इनमें से 60-70 प्रतिशत बच्चे स्कूल आने जाने के लिए वाहन का उपयोग करते हैं। वहीं भारत सरकार के वाहन (Vahan) डैशबोर्ड के अनुसार, प्रदेश में पंजीकृत Educational Institute Bus की श्रेणी में लगभग 7756 वाहन दर्ज हैं। रायपुर, दुर्ग-भिलाई और बिलासपुर जैसे बड़े शहरों में इनकी सघनता सबसे अधिक है।

जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में स्कूली वाहनों की स्थिति बेहद नाजुक है। बीते एक साल (2025-26) में प्रदेश भर में स्कूली बस, वैन और ऑटो से जुड़े कई छोटे-बड़े हादसे दर्ज किए गए हैं। रायपुर के टाटीबंध और भिलाई के पावर हाउस चौक जैसे इलाकों में 15% हादसे सिर्फ स्कूली छुट्टी के वक्त भारी वाहनों की चपेट में आने से हुए हैं।
परिवहन विभाग की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में दौड़ रही करीब 25% स्कूल बसें फिटनेस और सुरक्षा मानकों (जैसे पैनिक बटन और जीपीएस) पर खरी नहीं उतरतीं।
क्या है तेलंगाना का लंदन मॉडल
दरअसल, तेलंगाना के साइबराबाद में पुलिस ने लंदन ट्रांसपोर्ट मॉडल पर आधारित एक मास्टर प्लान तैयार किया है। इसमें 15,000 स्कूल बसों को एक स्मार्ट नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। बसों का रूट किसी इंसान के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तय करेगा, जिससे ट्रैफिक जाम में 30% तक की कमी आएगी। पेरेंट्स अपने मोबाइल पर देख सकेंगे कि बस कहां है और उसकी स्पीड क्या है। एक ही रूट के कई स्कूलों के लिए एक ही कॉमन बस चलेगी, जिससे सड़कों पर गाड़ियों का बोझ कम होगा।
छत्तीसगढ़ में किस बात का है इंतजार
बता दें कि तेलंगाना के साइबराबाद में जो सिस्टम लागू हुआ है, वो इन आंकड़ों को शून्य पर लाने की ताकत रखता है। छत्तीसगढ़ में 60% हादसे ओवरस्पीडिंग की वजह से होते हैं। लंदन मॉडल में AI ड्राइवर की हर हरकत पर नजर रखता है। रायपुर की सड़कों पर सुबह 8 बजे और दोपहर 2 बजे जो ट्रैफिक का दबाव होता है, उसे तेलंगाना मॉडल की शेयर्ड बस सर्विस 30% तक कम कर सकती है।
छत्तीसगढ़ में अक्सर ड्राइवरों के पास न तो सही ट्रेनिंग होती है और न ही उनका पुलिस वेरिफिकेशन। जबकि लंदन मॉडल में बिना डिजिटल वेरिफिकेशन के कोई ड्राइवर स्टीयरिंग नहीं छू सकता।
क्या बच्चों की जान से कीमती है बजट?
बता दें कि इस हाईटेक सिस्टम को लागू करने की लागत एक नई सड़क बनाने से भी कम है। एक स्मार्ट ऐप और पुलिस कंट्रोल रूम को एकीकृत करने में प्रशासन को बस थोड़ी सी इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है। ऐसे में सवाल यह है कि जब स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा सकते हैं, तो बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल कवच क्यों नहीं? आखिर हम पड़ोसी राज्य तेलंगाना जैसे सफल प्रयोगों से सीख क्यों नहीं सबक ले सकते… क्या सिस्टम को किसी बड़े हादसे का इंतजार है?


