टीआरपी डेस्क। “मौत से मुठभेड़ करती परंपरा…पांढुर्णा-सावरगांव में 23 अगस्त को गोटमार मेला का आयोजन किया जाएगा। महाराष्ट्र राज्य के पांढुर्णा और सावरगांव के संगम क्षेत्र में हर साल अगस्त में आयोजित होने वाला एक पारंपरिक और ऐतिहासिक मेला है। इसे पोलावारी पर्व के दिन मनाया जाता है। इसमें दो गांव के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। जिसमें कई लोग घायल भी होते है और बीते सालों में कई लोगों ने जान भी गवां दी है। आइए जानते है कि आखिर ऐसा मेला और ये खेल क्यों खेला जाता है, क्या है इसके पीछे की कहानी।
हर साल पत्थर बरसाने का इस खूनी खेल के पीछे एक दुखद प्रेम कहानी है, जिसका अंत खून से हुआ था। मान्यता है कि, पांढुर्णा के युवक और सावरगांव की युवती के बीच प्रेम संबंध था। पर ये रिश्ता परिवार को राजी नहीं था। अपने प्रेम को सफल बनाने के लिए दोनों युवक और युवती अपने घर से भाग गए। लेकिन, जैसे ही युवक ने युवती को पांढुर्णा लाने का प्रयास किया, दोनों के बीच जाम नदी पर पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस पत्थरबाजी में प्रेमी युगल की मौत हो गई। तब से प्रायश्चित के तौर पर ये परंपरा निभाई जा रही है। इसके साथ ही गोटमार मेले को लेकर अन्य कहानियां भी प्रचलित है, जैसे कि, जाम नदी के किनारे भोंसला राजा की सैन्य टुकड़ियां रहती थीं। सैनिक अपने युद्धाभ्यास और निशानेबाजी की क्षमता बढ़ाने के लिए नदी के बीच झंडा गाड़कर *पत्थरबाजी का अभ्यास करते थे। धीरे-धीरे यह अभ्यास एक परंपरा का रूप ले लिया और इसे आज भी गोटमार मेला के रूप में मनाया जाता है।
मेले का धार्मिक महत्व
गोटमार मेले के पहले हजारों भक्त देवी चंडिका के मंदिर में माथा टेकते हैं। मेले का आयोजन धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना के साथ जुड़ा हुआ है। मेले में हिस्सा लेने वाले लोग पूजा-अर्चना के बाद ही खेल में शामिल होते हैं। यह मेला स्थानीय संस्कृति, परंपरा और ऐतिहासिक घटनाओं को जीवित रखता है। गोटमार मेला स्थानीय लोगों के लिए सांस्कृतिक गर्व और सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
प्रशासनिक कार्रवाई
आस्था से जुड़ा होने के कारण इसे रोक पाने में असमर्थ प्रशासन व पुलिस एक दूसरे का खून बहाते लोगों को असहाय देखते रहने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते। निर्धारित समय अवधि में पत्थरबाजी समाप्त कराने के लिए प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों को बल प्रयोग भी करना पड़ता है। कई बार प्रशासन ने पत्थरों की जगह तीस हजार रबर की छोटे साइज की गेंद उपलब्ध कराई थी, परंतु दोनों गांवों के लोगों ने गेंद का उपयोग नहीं करते हुए पत्थरों का उपयोग ही किया था। थकहार कर प्रशासन ने दोनों गांवों के लोगों को नदी के दोनों किनारों पर पत्थर उपलब्ध कराना शुरू किया था। लेकिन साल 2009 में मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के बाद छिंदवाड़ा जिला प्रशासन ने पांढुरना एवं सावरगांव के बीच होने वाले गोटमार मेले में पत्थर फेंकने पर रोक लगाते हुए मेला क्षेत्र में छह दिनों के लिए धारा 144 लागू कर दी।


