टीआरपी डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि केवल सरकार या मुख्यमंत्री की आलोचना करने को अपराध नहीं कहा जा सकता और इस आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।
यह आदेश दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के मामले में दिया गया, जिन पर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाली एक ऑनलाइन रिपोर्ट के कारण एफआईआर दर्ज की गई थी। अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए कहा कि लोकतंत्र में आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि राज्य या पुलिस को पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई से पहले यह देखना होगा कि आरोपों का कोई कानूनी आधार है या नहीं। कोर्ट ने साफ कहा, लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपराध नहीं कहा जा सकता। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को बोलने और लिखने का अधिकार देता है।
अभिषेक उपाध्याय ने अपने लेख में प्रदेश में प्रशासनिक पदों पर जाति आधारित तैनातियों पर सवाल उठाए थे। शिकायतकर्ता ने इसे भ्रामक बताते हुए सरकार विरोधी रिपोर्ट करार दिया और उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के साथ आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत एफआईआर दर्ज कराई।
पत्रकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा कि राज्य सरकार उन्हें डराने के लिए लगातार एफआईआर दर्ज करा रही है और एसटीएफ तक को उनके खिलाफ लगाया गया। अदालत ने इन कार्रवाइयों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए यूपी सरकार से चार हफ्तों में जवाब मांगा है।
अदालत ने कहा, लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है। सरकार की आलोचना को राजद्रोह या आपराधिक कृत्य नहीं कहा जा सकता। अदालत के इस रुख से पत्रकारों को बड़ी राहत मिली है, खासकर उन मामलों में जहां आलोचनात्मक रिपोर्टिंग पर सरकारी दबाव या मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार मुताबिक, भारत में 2012 से 2022 के बीच 423 पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए।


