कोरबा। रेल विभाग ने कोरबा रेलवे स्टेशन से गेवरा रोड के बीच तीसरी रेल लाइन बिछाने की योजना बनाई है। इसी के तहत कोरबा के इंदिरा नगर, दुरपा रोड इलाकों में बरसों से मकान बनाकर रह रहे लोगों को हटने को कहा जा रहा है। लगभग 90 मकानों पर लाल क्रॉस लगाए जाने के बाद लोगों का ग़ुस्सा फूट पड़ा और
उन्होंने रेलवे क्रॉसिंग के पास प्रदर्शन किया। ओवर ब्रिज के नीचे उनके द्वारा की गई घेराबंदी से चक्का जाम की स्थिति निर्मित हो गई। प्रशासन के इस आश्वासन पर लोग यहां से हटे कि रेलवे से बातचीत के बाद ही अगली कोई कार्रवाई होगी।

कोरबा में रेलवे के द्वारा अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार करने का कयास इस बात से लगाया जा रहा है कि उसने अपने हिस्से की जमीन का उपयोग करने का मन बना लिया है। संजय नगर लक्ष्मणबन क्षेत्र में अंडरपास बनना है और इसके लिए प्रक्रिया शुरू हुई है। यहां पर मुआवजा वितरण के साथ मकान हटाए गए हैं। जबकि रेलवे के निशाने पर इंदिरा नगर का इलाका भी है। खबर के अनुसार इस इलाके में रेलवे की जमीन है, जहां पर बीते वर्षों में पक्के निर्माण हो गए हैं। 1 महीने पहले रेलवे ने अपनी जमीन पर काबिज लोगों को नोटिस दिए थे। उनकी संख्या 250 के आसपास बताई गई जबकि हाल में ही 90 मामलों में मार्किंग करने के साथ उन्हें तोड़ने का नोटिस दिया गया। संभावित कार्रवाई के डर से लोग नाराज हो गए। महिलाओं और बच्चों के साथ क्षेत्र के लोगों ने सुबह मुख्य मार्ग स्थित रेलवे क्रॉसिंग के पास चक्का जाम कर दिया। इससे तीन-चार दिशाओं में आवागमन बाधित हो गया। लोग यहां पर नारेबाजी करते नजर आए।

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चक्का जाम की सूचना मिली तो पुलिस बल के साथ प्रशासन के अधिकारी यहां पहुंचे। बताया गया कि आजकल में रेलवे के अधिकारियों से इस बारे में बातचीत की जाएगी। उनसे पूरे मामले की जानकारी लेंगे। किसी भी निष्कर्ष और विकल्प पर पहुंचे बिना रेलवे यहां पर अगली कार्रवाई नहीं करेगा। पार्षद तामेश अग्रवाल ने बताया कि प्रशासन की ओर से स्थानीय लोगों को सकारात्मक आश्वासन मिला है। हम आगे की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रशासन के द्वारा दिए गए भरोसे के आधार पर मुख्य मार्ग में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने चक्का जाम समाप्त किया और अपने ठिकाने की तरफ लौट गए। इन सबके बावजूद लोगों की चिंता इस बात को लेकर बनी हुई है कि डर के बीच कितने दिन और कितनी रातें गुजर सकेंगी। स्थानीय लोगों की मांग यह नहीं है कि उन्हें बसाहट के साथ मुआवजा दिया जाए। उनका असली सवाल तो यही है कि वे लोग यहां पर कई दशक से काबिज हैं, तो रेलवे को इतने अर्से के बाद अपनी जमीन की याद आखिर कैसे आई ?

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