Chhattisgarh High Court Judgment on Permanent Alimony: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि मध्यस्थता के दौरान 2 करोड़ रुपए जैसी अत्यधिक आर्थिक मांग करना, यदि वैवाहिक समझौते में बाधा बनता है, तो परिस्थितियों के अनुसार इसे पति के प्रति मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें महिला के लिए 10 लाख रुपए का एकमुश्त स्थायी भरण-पोषण तय किया गया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला रायपुर के एक दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह 29 जून 2020 को हुआ था। कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया और वे अलग रहने लगे। पति ने फैमिली कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया कि 7 फरवरी 2022 को पत्नी अपने भाई की शादी में जाने के बहाने मायके चली गई और लगभग 35 लाख रुपए मूल्य के पुश्तैनी आभूषण तथा अन्य कीमती सामान अपने साथ ले गई। पति का यह भी कहना था कि महिला थाना और सखी सेंटर में काउंसलिंग के बावजूद पत्नी वापस नहीं लौटी। इसके बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की याचिका दायर की।
फैमिली कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
फैमिली कोर्ट ने पति की आय, पत्नी की शैक्षणिक योग्यता और मामले के तथ्यों को देखते हुए पत्नी के लिए 10 लाख रुपए का एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता निर्धारित किया था। इस आदेश से असंतुष्ट पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर गुजारा भत्ते की राशि बढ़ाकर 2 करोड़ रुपए करने की मांग की।
मध्यस्थता में 2 करोड़ की मांग पर क्या कहा हाईकोर्ट?
हाईकोर्ट ने 18 जून 2026 को दोनों पक्षों को मध्यस्थता केंद्र भेजा था, ताकि आपसी सहमति से विवाद का समाधान हो सके। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि मध्यस्थता के दौरान पत्नी ने एकमुश्त 2 करोड़ रुपए की मांग रखी। पति ने अपनी आर्थिक स्थिति और व्यावसायिक खातों का हवाला देते हुए इतनी बड़ी राशि देने में असमर्थता जताई, जिसके बाद समझौता नहीं हो सका। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि अत्यधिक और असामान्य आर्थिक मांग के कारण मध्यस्थता विफल हो जाती है, तो यह इस बात का संकेत है कि वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं। ऐसे में विवाह को जबरन बनाए रखना पति के प्रति मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
पुलिस मामलों पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि अलग रहने के दौरान पत्नी ने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया। साथ ही मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर कथित फर्जी प्रोफाइल बनाने के आरोप में एफआईआर भी दर्ज कराई। फैसले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कहा कि इन परिस्थितियों को पति और उसके परिवार को प्रताड़ित एवं अपमानित करने के प्रयास के रूप में देखा गया। अदालत ने यह भी नोट किया कि पति और उसके परिजनों के प्रयासों के बावजूद पत्नी ने साथ रहने से लगातार इनकार किया।


