बिलासपुर। तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख मिलने वाले एक मुर्दे(Dead) को आखिरकार न्याय मिल ही गया। गबन के एक मामले में 19 साल पहले मर चुके बैंक कर्मचारी के निलंबन को आज बिलासपुर हाईकोर्ट (High court) ने ये कहते हुए रद्द कर दिया कि इसमें प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ। इसके साथ ही साथ उसके विधिक वारिस को सभी देयकों के भुगतान करने का आदेश दिया। यह लड़ाई उसका विधिक वारिस लड़ रहा था। इसके लिए उसको 37 साल तक मुकदमा लड़ना पड़ा। जस्टिस पी. सेम कोशी की अदालत में इस मामले की आखिरी सुनवाई हुई।
क्या था पूरा मामला:
अच्छे लाल दुबे जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक मर्यादित बिलासपुर में कैशियर के पद में कार्यरत थे। बैंक के आॅडिट में उनके कैश में दो लाख 40 हजार रुपये कम पाई गई। इस आर्थिक अनियमितता के आधार पर बैंक प्रबंधन ने 1982 में उन्हें बर्खास्त कर दिया था। उन्होंने बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं के समक्ष परिवाद पेश किया। यहां से राहत नहीं मिलने पर पंजीयक सहकारी संस्था एवं सहकारिता न्यायधिकरण में तक अपील की। सहकारिता ट्रिब्यूनल ने 1999 में अपील खारिज कर दी। इस पर 1999 में उन्होंने एमपी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
राज्य बनने के बाद मामले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजा गया। याचिका के लंबित रहने के दौरान ही याचिकाकर्ता की मौत हो गई। इसके बाद उनके विधिक वारिस ने प्रकरण को आगे बढ़ाया।
प्रक्रियाओं का नहीं हुआ पालन:
माननीय न्यायालय ने पाया कि बैंक प्रबंधन ने बर्खास्त करने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। याचिकाकर्ता को पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही बर्खास्त किया गया। कोर्ट ने इस न्याय के सिद्घांत के विपरीत होने पर बैंक प्रबंधन की समस्त कार्रवाई को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता के विधिक वारिस को उनके समस्त देयकों का भुगतान करने का आदेश दिया है। अब उसके देयकों का भुगतान उसका विधिक वारिस करेगा।

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