Bastar Dussehra: छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से बिल्कुल अलग है। करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में रावण दहन नहीं होता, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना, विशाल रथ की परिक्रमा और जनजातीय परंपराओं को विशेष महत्व दिया जाता है।
बस्तर की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े इस उत्सव के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता को लेकर प्रशासन तैयारियों में जुटा है। इस आयोजन के जरिए बस्तर की सदियों पुरानी परंपराओं और जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने की उम्मीद है।
बस्तर दशहरा दूसरे दशहरों से कैसे अलग है?
आमतौर पर दशहरे का नाम आते ही रावण दहन और बुराई पर अच्छाई की जीत का दृश्य सामने आता है। लेकिन बस्तर में दशहरे की परंपरा का केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना है। यहां धार्मिक अनुष्ठानों, स्थानीय देवी-देवताओं और सामुदायिक भागीदारी के साथ यह महापर्व मनाया जाता है। इस उत्सव की जड़ें बस्तर के ऐतिहासिक राजपरिवार और मां दंतेश्वरी की उपासना से जुड़ी हैं। मान्यता है कि राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में इस परंपरा को विशेष विस्तार मिला। धीरे-धीरे यह राजपरिवार तक सीमित न रहकर पूरे बस्तर अंचल की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान बन गया।
75 दिनों तक चलती हैं अलग-अलग रस्में
बस्तर दशहरे की शुरुआत हरेली अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से होती है। इस रस्म में पवित्र लकड़ी और रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाले औजारों की पूजा की जाती है। इसके साथ ही महापर्व के विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू होता है।
- काछिनगादी: काछिन देवी की आराधना के जरिए पर्व और रथ संचालन के लिए पारंपरिक अनुमति लेने की रस्म।
- जोगी बिठाई: उत्सव के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना के साथ तपस्या और साधना की परंपरा।
- रथ परिक्रमा: विशाल लकड़ी के रथ को श्रद्धालुओं और ग्रामीणों द्वारा खींचा जाता है। यह सामूहिक भागीदारी का प्रतीक है।
- मावली परघाव: दंतेवाड़ा से आने वाली मां दंतेश्वरी की डोली और संबंधित धार्मिक प्रतीकों का पारंपरिक स्वागत।
- निशा जात्रा: रात में देवी आराधना से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान।
- मुरिया दरबार: सामाजिक मुद्दों, जनसमस्याओं और सामुदायिक संवाद से जुड़ी ऐतिहासिक परंपरा।
इन रस्मों के जरिए बस्तर की धार्मिक आस्था, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत की झलक मिलती है।
23 अक्टूबर को मुरिया दरबार में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
बस्तर दशहरे के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता को देखते हुए प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। आयोजन से पहले कमिश्नर डोमन सिंह, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने मां दंतेश्वरी मंदिर, सिरहासार भवन और लालबाग मैदान का निरीक्षण किया।
अधिकारियों ने मंच निर्माण, बैरिकेडिंग, सुरक्षा, यातायात और आम नागरिकों की सुविधाओं से जुड़े इंतजामों की समीक्षा की। सभी आवश्यक कार्य निर्धारित समय-सीमा में पूरे करने के निर्देश भी दिए गए। सिरहासार भवन में मुरिया दरबार की बैठक व्यवस्था और लालबाग मैदान में प्रस्तावित आमसभा की तैयारियों का जायजा लिया गया। इसके अलावा बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित प्रदर्शनी की व्यवस्थाएं भी देखी गईं। राष्ट्रपति के प्रस्तावित दौरे को बस्तर की परंपराओं और जनजातीय संस्कृति को व्यापक राष्ट्रीय पहचान दिलाने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
मुरिया दरबार क्यों है खास?
मुरिया दरबार बस्तर दशहरे की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इसमें विभिन्न गांवों और समुदायों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर आने का अवसर मिलता है। परंपरागत रूप से यह स्थानीय मुद्दों, अपेक्षाओं और सामाजिक सरोकारों को सामने रखने से भी जुड़ा रहा है। इसकी खासियत यह है कि यहां सांस्कृतिक उत्सव और सामुदायिक संवाद एक साथ दिखाई देते हैं। जनजातीय समाज की भागीदारी इस परंपरा को विशिष्ट बनाती है। यही वजह है कि मुरिया दरबार को बस्तर की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
मां दंतेश्वरी की आस्था से जुड़ा है पूरा उत्सव
बस्तर दशहरे में मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा का विशेष स्थान है। स्थानीय देवी-देवताओं, ग्राम देवताओं और पारंपरिक मान्यताओं को उत्सव के दौरान सम्मान दिया जाता है। इस महापर्व की तैयारियों से लेकर विभिन्न अनुष्ठानों तक स्थानीय समुदायों की भागीदारी बनी रहती है। प्रकृति, आध्यात्मिक विश्वास और सामुदायिक जीवन के बीच का संबंध भी इन परंपराओं में दिखाई देता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती ये रस्में बस्तर की जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक निरंतरता को मजबूत करती हैं।
बस्तर की विरासत को पर्यटन से जोड़ने की कोशिश
बस्तर दशहरा सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसकी लंबी अवधि, विशाल रथ, धार्मिक अनुष्ठान, लोककलाएं और जनजातीय परंपराएं पर्यटकों को क्षेत्र की संस्कृति को करीब से जानने का अवसर देती हैं। जगदलपुर में बस्तर दशहरा पसरा जैसी सुविधाएं स्थानीय व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। बस्तर का डोकरा शिल्प, टेराकोटा और काष्ठ शिल्प भी यहां की पारंपरिक कला के प्रमुख उदाहरण हैं। पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय कारीगरों, छोटे व्यापारियों, परिवहन सेवाओं और आवास से जुड़े व्यवसायों को अवसर मिल सकते हैं। इसके लिए बेहतर संपर्क सुविधाएं, स्वच्छता, सुरक्षा और पर्यटकों को सही जानकारी उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
साय सरकार के सामने विरासत को सहेजने की चुनौती
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण और पर्यटन से जोड़ने पर जोर दे रही है। बस्तर दशहरा जैसी परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण अहम है। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति, सामाजिक सहभागिता और स्थानीय पहचान का प्रतीक है। इसकी परंपराओं को सहेजना आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ स्थानीय कला और आजीविका को भी प्रोत्साहित कर सकता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता के बीच बस्तर दशहरा एक बार फिर अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के कारण चर्चा में है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व बताता है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में हर क्षेत्र की अपनी अलग परंपरा और पहचान है।



