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Chhattisgarh High Court: जेब से मिले 8 हजार के नोट, फिर भी बरी! हाईकोर्ट ने क्यों पलटा 9 साल पुराना फैसला?

Chhattisgarh High Court ने करीब एक दशक पुराने रिश्वत मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि आरोपी के पास से रिश्वत की रकम बरामद होना अकेले दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और उसे स्वीकार भी किया […]

Chhattisgarh High Court bribery case verdict and corruption case hearing
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Chhattisgarh High Court ने करीब एक दशक पुराने रिश्वत मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि आरोपी के पास से रिश्वत की रकम बरामद होना अकेले दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और उसे स्वीकार भी किया था। मांग का विश्वसनीय प्रमाण नहीं होने पर सिर्फ रकम की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

यह फैसला न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने 18 सितंबर को सुनाया। कोर्ट ने सूरजपुर विशेष न्यायालय के मार्च 2017 के फैसले को निरस्त कर दिया। इस फैसले में तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को रिश्वत के मामले में दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद उन्हें बरी कर दिया।

8 हजार रुपए की रिश्वत का था आरोप

अभियोजन के अनुसार, मां सरस्वती शिक्षा समिति द्वारा संचालित स्कूल की मान्यता से जुड़े काम के लिए समिति के अध्यक्ष से पहले 15 हजार रुपए की मांग किए जाने का आरोप था। बाद में कथित रिश्वत की रकम 8 हजार रुपए तय होने की बात सामने आई। शिकायत के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो ने 30 जून 2014 को सूरजपुर स्थित जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में ट्रैप की कार्रवाई की। अभियोजन का दावा था कि मुरली प्रसाद चौधरी ने 8 हजार रुपए स्वीकार किए और रकम उनकी जेब से बरामद हुई। नोटों पर रासायनिक परीक्षण में भी संपर्क की पुष्टि होने की बात अभियोजन ने कही थी। हालांकि, ट्रायल के दौरान मुख्य गवाहों के बयान अभियोजन के पक्ष में नहीं रहे।

शिकायतकर्ता ने ही रिश्वत मांगने की बात नहीं मानी

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने कहा कि लेखापाल ने उससे रिश्वत की मांग नहीं की थी। एक अन्य गवाह के बयान में भी कथित तौर पर कहा गया कि शिकायतकर्ता ने पैसे जबरन आरोपी की जेब में डाल दिए थे। कोर्ट ने इन बयानों को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने पाया कि रिश्वत मांगने के मूल आरोप की पुष्टि किसी विश्वसनीय गवाह से नहीं हुई। ऐसे में केवल आरोपी की जेब से रकम मिलना रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

ऑडियो रिकॉर्डिंग भी नहीं बनी पुख्ता सबूत

अभियोजन ने कथित रिश्वत मांग को साबित करने के लिए बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भी भरोसा किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए। अदालत के सामने यह बात आई कि रिकॉर्डिंग के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत जरूरी प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था। इसके अलावा आरोपी की आवाज का नमूना लेने और रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज का फॉरेंसिक परीक्षण कराने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं की गई थी। ऐसी स्थिति में कोर्ट ने रिकॉर्डिंग को रिश्वत की मांग साबित करने वाला विश्वसनीय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मानने से इनकार किया।

हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की 2017 की सजा?

हाईकोर्ट ने माना कि रिश्वत की मांग साबित होना अभियोजन के मामले का बुनियादी हिस्सा है। जब मांग और स्वीकार किए जाने का विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया, तो सिर्फ रकम की बरामदगी और रासायनिक जांच के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती। इसी आधार पर अदालत ने सूरजपुर विशेष न्यायालय के मार्च 2017 के फैसले को रद्द कर दिया और तत्कालीन लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को मामले में बरी कर दिया।

Chhattisgarh High Court के फैसले का मुख्य संदेश

इस मामले में अदालत ने रिश्वत के आरोप की जांच में मांग और स्वीकार किए जाने के विश्वसनीय प्रमाण के महत्व को रेखांकित किया है। यानी ट्रैप कार्रवाई में रकम बरामद होना अपने आप में अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता, यदि अभियोजन रिश्वत की मांग को भरोसेमंद साक्ष्यों से स्थापित नहीं कर पाता।

Rverma
लेखक / पत्रकार:

Rverma

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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