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Health Tips: जंक फूड छोड़ने पर शरीर में क्या बदलाव होते हैं? जानिए पहले दिन से लेकर लंबे समय तक का असर

Health Tips: पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स, पैकेज्ड स्नैक्स और मीठे ड्रिंक्स आज हमारी डाइट का अहम हिस्सा बन चुके हैं। स्वाद के कारण इन्हें छोड़ना आसान नहीं होता। लेकिन, जब कोई व्यक्ति कुछ दिनों या हफ्तों के लिए जंक फूड से दूरी बनाता है, तो शरीर में कई तरह के बदलाव महसूस हो सकते […]

Healthy diet showing the changes that occur in the body after quitting junk food.
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Health Tips: पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स, पैकेज्ड स्नैक्स और मीठे ड्रिंक्स आज हमारी डाइट का अहम हिस्सा बन चुके हैं। स्वाद के कारण इन्हें छोड़ना आसान नहीं होता। लेकिन, जब कोई व्यक्ति कुछ दिनों या हफ्तों के लिए जंक फूड से दूरी बनाता है, तो शरीर में कई तरह के बदलाव महसूस हो सकते हैं। कुछ बदलाव शुरुआती दिनों में ही नजर आने लगते हैं, जबकि कुछ असर लंबे समय तक स्वस्थ खानपान बनाए रखने के बाद दिखाई देते हैं।

हालांकि, हर व्यक्ति में इसका असर अलग हो सकता है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि पहले उसकी डाइट में जंक फूड की मात्रा कितनी थी और उसकी जगह वह कौन-से खाद्य पदार्थ ले रहा है।

शुरुआत में क्रेविंग कर सकती है परेशान

जंक फूड छोड़ने के शुरुआती दिनों में सबसे बड़ी चुनौती कुछ खास चीजें खाने की इच्छा हो सकती है। खासकर अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से बहुत मीठे, नमकीन या अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड का सेवन करता रहा हो। ऐसे में अचानक इन चीजों को कम करने पर बार-बार स्नैक खाने का मन कर सकता है। कुछ लोगों को शुरुआत में थकान, चिड़चिड़ापन या सिरदर्द भी महसूस हो सकता है। हालांकि, ये लक्षण हर व्यक्ति में होना जरूरी नहीं है और इनके कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। इस दौरान पर्याप्त पानी पीना और भोजन में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और प्रोटीन से भरपूर चीजें शामिल करना मददगार हो सकता है।

भूख और एनर्जी पर पड़ सकता है असर

जब जंक फूड की जगह संतुलित भोजन लिया जाता है तो शरीर को ज्यादा पोषक तत्व मिलने लगते हैं। फाइबर और प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद कर सकते हैं। इससे बार-बार कुछ खाने की इच्छा कम हो सकती है। वहीं, मीठे पेय और ज्यादा शुगर वाले स्नैक्स कम करने पर खाने-पीने की आदतों में भी बदलाव महसूस हो सकता है।

पाचन तंत्र को मिल सकता है फायदा

जंक फूड की जगह फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज बढ़ाने से डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ सकती है। फाइबर पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी है।इससे कुछ लोगों को कब्ज की समस्या में राहत मिल सकती है और पेट साफ रहने में मदद मिल सकती है। हालांकि, फाइबर की मात्रा अचानक बहुत ज्यादा बढ़ाने के बजाय धीरे-धीरे बढ़ाना और पर्याप्त पानी पीना जरूरी है।

वजन कंट्रोल करने में मिल सकती है मदद

कई जंक फूड में कैलोरी, नमक, शुगर और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा ज्यादा होती है। इन्हें कम करने से कुल कैलोरी सेवन कम हो सकता है, खासकर तब जब उनकी जगह पौष्टिक और संतुलित भोजन लिया जाए। इससे कुछ लोगों में वजन को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। लंबे समय तक संतुलित खानपान बनाए रखने से ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और हृदय स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को कम करने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका असर केवल जंक फूड छोड़ने पर निर्भर नहीं करता। शारीरिक गतिविधि, नींद, उम्र, आनुवंशिकता और पूरी डाइट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

त्वचा और नींद में महसूस हो सकता है फर्क

जंक फूड कम करके जब डाइट में पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं, तो शरीर को जरूरी विटामिन, मिनरल और अन्य पोषक तत्व बेहतर तरीके से मिल सकते हैं। कुछ लोगों को समय के साथ त्वचा और सामान्य ऊर्जा स्तर में बदलाव महसूस हो सकता है। वहीं, देर रात पिज्जा, बर्गर, चिप्स या मीठे पेय लेने की आदत कम करने से नींद की दिनचर्या भी बेहतर हो सकती है। हालांकि, नींद पर कैफीन, स्क्रीन टाइम, तनाव और सोने के समय जैसे कई दूसरे कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।

क्या जंक फूड पूरी तरह छोड़ना जरूरी है?

स्वस्थ रहने के लिए हर व्यक्ति को जंक फूड हमेशा के लिए पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे खाद्य पदार्थ रोजमर्रा की डाइट का मुख्य हिस्सा न बनें। संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी, नियमित शारीरिक गतिविधि और प्रोसेस्ड या फास्ट फूड का सीमित सेवन लंबे समय तक बेहतर खानपान की आदत बनाने में मदद कर सकता है। इसलिए जंक फूड कम करने का असर केवल किसी एक बदलाव तक सीमित नहीं है। इसका फायदा पूरी डाइट की गुणवत्ता बेहतर होने से जुड़ा हो सकता है।

Rajnisen
लेखक / पत्रकार:

Rajnisen

शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सरोकार रिपोर्टर

सामाजिक न्याय एवं महिला सशक्तिकरण विषयों पर लेखन

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और जनसुविधाओं पर विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग।

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