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Mental Fatigue: सुबह उठकर भी दिमाग रहता है थका? 20 मिनट की ये आसान रूटीन बदल सकती है आपका दिन

Mental Fatigue: कई बार सुबह उठने के बाद भी काम शुरू करने का मन नहीं करता। छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन होने लगता है और दिमाग लगातार थका हुआ महसूस करता है। ऐसे में खुद को आलसी समझने के बजाय अपनी दिनचर्या पर ध्यान देना जरूरी है। नींद की कमी, लगातार तनाव, ज्यादा स्क्रीन टाइम, अनियमित […]

Woman feeling mentally tired after waking up and following a 20-minute morning wellness routine
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Mental Fatigue: कई बार सुबह उठने के बाद भी काम शुरू करने का मन नहीं करता। छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन होने लगता है और दिमाग लगातार थका हुआ महसूस करता है। ऐसे में खुद को आलसी समझने के बजाय अपनी दिनचर्या पर ध्यान देना जरूरी है। नींद की कमी, लगातार तनाव, ज्यादा स्क्रीन टाइम, अनियमित रूटीन और मानसिक थकान इसकी वजह हो सकते हैं।

मानसिक थकान को समझने का मतलब खुद किसी बीमारी का निदान करना नहीं है। इसका मतलब अपने शरीर और रोजमर्रा की आदतों के संकेतों पर ध्यान देना है। अगर फोकस करने में परेशानी हो रही है, सामान्य काम भी भारी लग रहे हैं, नींद के बाद भी तरोताजा महसूस नहीं होता या सोशल मीडिया और स्क्रीन इस्तेमाल करने के बाद मानसिक थकान बढ़ती है, तो अपनी दिनचर्या में बदलाव पर ध्यान देना चाहिए।

नींद से समझौता न करें

फिजिकल और मेंटल एनर्जी के लिए पर्याप्त नींद जरूरी है। देर रात तक फोन चलाना और सुबह जल्दी उठना लंबे समय में रूटीन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए कोशिश करें कि रोज लगभग एक ही समय पर सोएं और उठें। सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन और काम से दूरी बनाना भी जरूरी है।

शरीर को एक्टिव रखें

लगातार बैठे रहने से भी शारीरिक और मानसिक थकान महसूस हो सकती है। इसके लिए हर बार जिम जाना जरूरी नहीं है। हर 45-60 मिनट में कुछ मिनट के लिए उठकर चलें। फोन पर बात करते समय टहल सकते हैं। लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें और खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलें। रोज की छोटी-छोटी एक्टिविटीज भी शरीर को एक्टिव रखने में मदद कर सकती हैं।

दिमाग को स्क्रीन से दें ब्रेक

काम खत्म होने के बाद भी सोशल मीडिया, वीडियो और मैसेजिंग में व्यस्त रहने से दिमाग को आराम का समय कम मिल सकता है। इसलिए दिन में कम से कम 20-30 मिनट का नो-स्क्रीन ब्रेक रखें। इस दौरान टहलें, परिवार से बात करें, किताब पढ़ें या कुछ देर शांत बैठें। खासकर सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना फायदेमंद हो सकता है।

एक साथ कई काम करने से बचें

मल्टी-टास्किंग से कई बार ज्यादा काम करने का एहसास हो सकता है, लेकिन लगातार एक काम से दूसरे काम पर जाना मानसिक रूप से थकाऊ हो सकता है। इसलिए एक समय में एक ही काम पर ध्यान देने की कोशिश करें।बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटें और बीच में छोटे ब्रेक लें। दिन के सिर्फ तीन जरूरी काम तय करना भी मानसिक बोझ कम करने का आसान तरीका हो सकता है।

सिर्फ पेट भरने के लिए न खाएं

व्यस्त दिनचर्या में खाना छोड़ देना, बहुत देर से खाना या लगातार प्रोसेस्ड फूड पर निर्भर रहना आसान हो जाता है। इसकी जगह डाइट में दालें, सब्जियां, फल, साबुत अनाज, प्रोटीन और दूसरी पौष्टिक चीजें शामिल करने की कोशिश करें। साथ ही शरीर में पानी की कमी न होने दें।

कुछ मिनट सांस पर ध्यान दें

तनाव के दौरान कई बार सांस तेज या उथली हो सकती है। ऐसे में कुछ मिनट शांत होकर सांस पर ध्यान देना दिन के बीच एक छोटा ब्रेक दे सकता है। इसके लिए आराम से बैठें और कंधों को ढीला छोड़ दें। सांस को जबरदस्ती गहरा किए बिना धीरे-धीरे सांस लें और आराम से छोड़ें। इसे 2-5 मिनट तक किया जा सकता है। अगर चक्कर, असहजता या परेशानी महसूस हो तो इसे रोक दें और सामान्य तरीके से सांस लें।

रोज थोड़ा समय खुद के लिए निकालें

दिन का ज्यादातर समय स्क्रीन और घर या काम की चारदीवारी में गुजर सकता है। ऐसे में कुछ देर बाहर निकलना, पेड़ों के बीच चलना या खुले वातावरण में बैठना मानसिक थकान से ब्रेक लेने का आसान तरीका हो सकता है। रोज 10-20 मिनट किसी पार्क, गार्डन या खुली जगह पर बिना फोन के चलने की कोशिश करें। इसे एक्सरसाइज का टार्गेट न बनाएं। इसे दिमाग के लिए एक छोटे रीसेट ब्रेक की तरह लें।

20 मिनट की आसान मेंटल वेलनेस रूटीन

अगर शुरुआत करना मुश्किल लग रहा है, तो 20 मिनट की यह आसान रूटीन अपनाई जा सकती है।

  • 5 मिनट: शांत होकर सांस पर ध्यान दें।
  • 10 मिनट: बाहर टहलें, हो सके तो प्रकृति के बीच।
  • 5 मिनट: फोन से दूर बैठकर दिन की प्राथमिकताएं तय करें।

इस रूटीन का मकसद किसी बीमारी का इलाज करना नहीं है। इसका उद्देश्य दिन के बीच खुद को थोड़ा समय देना और अपनी दिनचर्या पर ध्यान देना है।

कब इसे सिर्फ थकान समझकर नजरअंदाज न करें?

अगर थकान लंबे समय तक बनी रहती है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नींद या भूख में लगातार बदलाव, लगातार उदासी या बेचैनी महसूस होना या सामान्य जिंदगी संभालने में परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

Rajnisen
लेखक / पत्रकार:

Rajnisen

शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सरोकार रिपोर्टर

सामाजिक न्याय एवं महिला सशक्तिकरण विषयों पर लेखन

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और जनसुविधाओं पर विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग।

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