Jheeram Ghati Massacre: छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक झीरम घाटी नरसंहार मामले में एनआईए की विशेष अदालत ने भले ही 10 नक्सलियों को फांसी की सजा सुना दी हो, लेकिन इस भयावह घटना का मुख्य राजनीतिक षड्यंत्र अभी भी पर्दे के पीछे छिपा हुआ है। इस भीषण हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व समेत 30 लोगों की जान चली गई थी।
हालांकि अदालती कार्रवाई में हमलावर नक्सलियों को सजा मिल चुकी है, लेकिन इस बात से पर्दा उठना अभी बाकी है कि आखिर यह नरसंहार किसके इशारे और साजिश के तहत अंजाम दिया गया था।
दरभा थाने में दर्ज दूसरी एफआईआर और एसआईटी का गठन
इस मामले की गहराई में छिपी राजनीतिक साजिश की जांच के लिए 26 मई 2020 को दरभा थाने में एक दूसरी एफआईआर दर्ज कराई गई थी। यह एफआईआर झीरम में मारे गए नेता उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार की याचिका पर दर्ज हुई थी, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि एनआईए की मुख्य जांच राजनीतिक षड्यंत्र के एंगल को पूरी तरह से नहीं टटोल रही है। इसके बाद तत्कालीन सरकार ने बस्तर आईजी विवेकानंद सिन्हा के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था ताकि असली साजिशकर्ताओं बेनकाब किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद कागजों में सिमटी जांच
साल 2023 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट निर्देश दिया था कि छत्तीसगढ़ पुलिस इस मामले में दर्ज दूसरी एफआईआर के तहत राजनीतिक षड्यंत्र के कोण पर अपनी जांच जारी रख सकती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनआईए की उस याचिका को खारिज कर दिया गया था जिसमें राज्य पुलिस की जांच रोकने की मांग की गई थी। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर एसआईटी की जांच आगे बढ़ने के बजाय केवल कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है, जिससे प्रशासनिक सुस्ती पर सवाल उठने लगे हैं।
अधिकारियों की बयानबाजी से साफ होती एसआईटी की लाचारी
एसआईटी की इस सुस्त और ढुलमुल चाल को लेकर जब जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल किए गए, तो उनकी तरफ से पल्ला झाड़ने वाले जवाब सामने आए। एसआईटी चीफ और एडीजी विवेकानंद सिन्हा का कहना है कि लोकल लेवल पर जगदलपुर जाकर पता कीजिए कि जांच में क्या हुआ। वहीं जगदलपुर के एसपी शलभ सिन्हा का कहना है कि यह जांच एसआईटी कर रही है और इस मामले में स्थानीय पुलिस की कोई विशेष भूमिका नहीं है। इस तरह की बयानों से यह साफ जाहिर होता है कि जांच प्रक्रिया किस हद तक भंवर में फंसी हुई है।
राजनीतिक बयानबाजी और कांग्रेस की सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने भी स्वीकार किया है कि दरभा थाने में एक और एफआईआर दर्ज हुई थी और एसआईटी का गठन हुआ था, लेकिन यह पता करना होगा कि उस टीम ने अब तक क्या कार्रवाई की है। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी और याचिकाकर्ता जितेंद्र मुदलियार ने एसआईटी की इस निष्क्रियता के खिलाफ गहरी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि वे इस मामले को लेकर एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं ताकि साजिश के असली चेहरों को बेनकाब किया जा सके।
25 मई 2013 का वह काला दिन जब उजड़ गया था कांग्रेस का नेतृत्व
तारीखों के पन्नों को पलटें तो 25 मई 2013 का वह दिन छत्तीसगढ़ के लिए कभी न भूलने वाला जख्म दे गया था। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सुकमा से ‘परिवर्तन रैली’ करके लौट रहा कांग्रेस नेताओं का काफिला जब दरभा थाना क्षेत्र की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तब 250 से 300 भारी हथियारों से लैस नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया था। इस खूनी संघर्ष में महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल और उदय मुदलियार सहित 30 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी, जिससे पूरा देश दहल उठा था।
आत्मसमर्पण करने वाले टॉप लीडर्स से पूछताछ क्यों नहीं?
कांग्रेस नेताओं का यह भी सवाल है कि एनआईए कोर्ट ने भले ही कुछ नक्सलियों को सजा सुना दी हो, लेकिन आत्मसमर्पण कर चुके कई खूंखार नक्सलियों और टॉप लीडर्स से इस बात की पूछताछ क्यों नहीं की जा रही है कि उन्होंने किसके इशारे पर इस बड़े राजनीतिक नरसंहार को अंजाम दिया था। जब तक इस बात का खुलासा नहीं होता कि इस साजिश के पीछे कौन लोग शामिल थे, तब तक झीरम घाटी के पीड़ितों और उनके परिवारों को असली न्याय मिलने की बात अधूरी ही मानी जाएगी।



